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رواية موعد في المساء الفصل الخامس و العشرون والاخير



 فريده احمد فريد

وعاد ف المساء

الفصل الخامس والعشرون...والاخير

المجد للقصص والحكايات 

لم  تحتمل  أكثر....صرخت  بألم  ...محمود  ركض  اليها...سندها...قال  لها  بهلع


(انتي كويسه...اخدك  المستشفى)


حاولت  دفعه  بعيداً  لكنه  مسكها  بقوه...قالت  له

(ابعد عني)


(بطه  انا  مش  هبعد  عنك  لو  اتطبقت السما ع الأرض...وعارف  انك  مش  هتسامحيني  حتي  لو  قلت لك  إيه...بس  انا  مش  راجع  اضايقك  او  اذلك  يا  فاطمه...انا  عايز  مراتي..عايز  اعيش  معاكي...وابني  يتولد  يلاقي  ابوه  وامه  مستنينه  ...عايز  اعيش  مع  عيلتي..ابني  عيله  بتاعتي  انا...عايز  اعوض  نفسي  عن  العيله  اللي  اتحرمت  منها  عايز  احن  ع ابني  واحضنه  كل  ليله  قبل ما  ينام  واقوله  بحبك....وعايز  مراتي  تحبني  اوي...انا  مش  هستحمل  اتخان  تاني  يا  بطه..وعارف  ان  معاكي  عمري  ما  هجرب  الاحساس  ده  تاني....عارف  انك  بنت  طيبه  ومحترمه  وبتخافي  ربنا...وده  كل  اللي  بترجاه  من  ربنا...ست محترمه  تصوني  وعيل  يملي  عليا  دنيتي...واللهي  واللهي العظيم  انا  ما  كنت  عارف  اعيش  من  غيرك  وخطبت  غرام  لانها   قالت  انها  بتحبني... بس  انا ما حبتهاش.. معرفتش  احبها... وبعد  ما سمعت  من  سعد  واخوه  انك  ف خطر  وقتها  بس  انا  فقت... عرفت  انا  ضيعت  ايه  من  ايدي  وكنت  هظلم  واحده  تانيه   معايا... بس  ربنا  برحمته  الواسعة   نور  لي  بصيرتي  ع  اخر لحظه... يا  بطه  انا  كل اللي  عايزه  فرصه... فرصه  واحده  بس  عشان  اعيش... انا  بجد  معرفتش  معني  الحياه  غير  ف بيتك... غير  وانا  معاكي... ودلوقتي   ف بيتك  برضو   عايز  ابدأ  حياه  جديده... افتح  معاكي  صفحه جديده   يا بطه  واعيش  مع  مراتي  اللي  بحبها   واستني  أبني  اللي  هتجنن  واشوفه  واخده  ف حضني.. وكمان  سعد  ويوسف  ربنا  كرمني  بيهم... بقوا  اخواتي  مش  صحابي  وبس... انتوا  كلكوا  كده  عيلتي  يا بطه... سامحيني  واديني   فرصه  اخيره...... فرصه  اخيره  عشان خاطر ربنا) 


فاطمه  نظرت  له... مسحت  الدموع  التي  فرت  من  عيناه... نظرت  للارض  وقالت  له


(وانا  مش  مسمحاك... ومش  هسامحك  بسهولة... بس  هديك  الفرصه  عشان  ما تقوليش  ظلمتيني... وعشان  ابني  مالوش  ذنب  يتولد  بعيد  عن  ابوه... هنعيش  سوا  بس  مش مع  بعض... عيش  ف حالك  يا محمود  وسبني  ف حالي... انت  لا بتحبني  ولا  عمرك  حبتني.. ولا  هتحبني  ف يوم... انا  عارفه  حاجه  زي دي  كويس... اتفضل  اطلع  غير  هدومك  وسبني  اسخن  الأكل  اللي  هيتحرق  ده) 


لم  تنظر  لعيناه.. لم  تستطع   ان  تنظر  له... استدارت  للموقد  وللطعام... كي تبكي  كما  تشاء... لكن


وجدت  يداه  تمر  بجوارها  وتغلق  الموقد... نظرت  له  بغضب... ضحك  وقال  وهوه  يضع  يداه  ع  صدره

حركه  تحدي


(وانا  مش  هسلم  يا  بطه  يا  متعوده  تديني  الأوامر  كأني  شغال  عند  أهلك... ولا  هسيبك  ف حالك... الليله  دي بالذات  هتنامي  ف حضني... عارفه  ليه... عشان  الأشكال  اللي  زيك  ما بيفهموش  غير  بالطريقه  دي  .. وانا  مقنع  اوي  ف الحاجات  دي... وبالنسبة  بقا  لحوار  هتسامحيني  ولاااا... دي  بقا  نسيبها  للظروف  عارفه  ليه... عشان انا  اتأكدت  انك  بتحبيني... غصب عنك  بتحبيني  يا بطتي... وانا كمان  بحبك... وهعمل لك  كل  اللي  هتقولي لي  عليه  عشان  اشوف  ضحكه  امك  ف  وشي... ها  لخصي  وهاتي  من الأخر  عايزاني  اعمل لك  إيه   عشان   تتأكدي اني  عايزك  انتي  وبحبك) 


اغمضت  عيناها  بألم  وقالت

(حط  نفسك  مكاني... شوف  كل اللي انت  عملته  فيا  من يوم ما دخلت  حياتي... للساعه  اللي  دخلت لي  فيها  من شويه... أعكس  الوضع  وقولي  كنت  هتعمل إيه... هتعمل  ايه  بعد ما هجرتك  وذليتك  وقسيت عليك  ورحت  اتخطبت  لراجل  غيرك... قلي  انا  اعمل لك  ايه  عشان  تسامحني... يا محمود  الحب  مش  كلمه... شوف  انا  بحب الأفلام   والمسلسلات   اللي  بتتكلم  كلها  ع الحب  والرومانسية   ورغم  كده  عارفه  انه  كلام  أفلام... عشان  دلوقتي   محدش  بيعرف  يحب... كله  بيقول  يلا نفسي... كله  بيدور  ع مصلحته  أولا... حتي  انا  ف بعدك  عني  ما فكرتش  إلا  ف نفسي   ... ايوا  قلت  سابني  هجرني  عملت له  ايه... ليه  يعمل  فيا  كده... بس،، يا محمود  انا  مفكرتش  للحظه  انت  حاسس بأيه... انت  يلي  عشت  طفوله  قاسيه  واتجبرت  ع واحده  خانتك  وهربت  من جريمه  مالكش  ذنب  فيها  وعشت  معايا... دا  غير  شخصيتك  البسيطه اللي  الكل  استضعفك  عليها.. كل  ده  انت  وبس  اللي  عشته  وعانيته  وانا... ما فكرتش  فيك  ولا  ف مشاعرك... ف كلامي  ده  يثبت  لك  اننا  كلنا  بقينا  أنانيين  يا  محمود... والجواز... العلاقه  المقدسه  دي  ما ينفعش  فيها  انانيه... لازم  الطرفين  يبقوا  عارفين  ان  مصلحه  الطرف التاني  اهم  من  مصلحته... يعني  الست  تعتبر  جوزها  مقدس  زي  ربها  وتفكر  فيه  وف  راحته  وف  سعادته.. والراجل  يفكر  ف مراته  زي  امه  واخته  ويفكر  ازاى  يحميها  ويحبها  ويحافظ  عليها  وع  كرامتها.... قلي  انت... قلي  مين  ف الزمن  ده  بيعمل  كده.. قلي... يا  محمود  ربنا بيقول  لا يغير الله  قوما  حتي  يغيروا  ما بأنفسهم... يعني  لو  انت  ما اتغيرتش  لنفسك.. وانا  نفس الكلام... يبقا  الحياه  بينا  غش  وكدب  وليها  مده صلاحيه  زي  معظم  جوازات  الايام  دي... لازم  يكون  ف بينا  احترام  وود  حقيقي... الحب  وساعه  السرير   دي  مش كفايه... انت  هتقدر  تعمل  كده.. هتقدر  تنفذ  كلام  ربنا  ف  علاقتنا... لو  هتقدر  تعمل  كده  انا  مستعده  اسامحك  واكمل  معاك... بس  تتأكد  قبل  ما توعدني  انك  اد  كلامك... عشان  لو  ما حافظتش  عليا  هسألك  ادام  ربنا... انا  بأمنك  عليا.. ع  نفسي.. انت  أد  الأمانه  دي) 


محمود  شعر  انه  عاجز  ع  الرد..... ع  كلامها... كم  شعر  الان  وهوه  يقف  يستمع  لكلامها  الصادق  الجميل


كم  شعر  انه  حقا  لم  يقدرها... تأكد  ان  المرأه  ليست  بجمالها  ولا  بذكاءها  ولا تعليمها ... بل  المرأه  الحقيقيه  هيه


من  تعرف  قيم  ومبادئ  دينها... من  تعامل زوجها  كما تريده  ان  يعاملها.... تتقي الله  فيه  وتحبه  بصدق


محمود  مد  يدها  لها وقال  بجديه

(ف حياتي  ما سمعتش  اجمل  من كلامك.... انا  موافق.. وأد  الامانه  دي  يا  فاطمه  وانا   بعاهد  نفسي  أدام  ربنا  اني  أتقيه  فيكي  واحترمك  واقدرك  ... وأحط  مصلحتك  وسعادتك  قبل اي حاجه  وكل حاجه... انا  بحبك  يا  بطه  وبحب  كلامك  وطريقتك ودماغك... ودلوقتي   انتي  كمان  تعاهديني  انك  هتتقي  ربنا  فيا  وهتصبري  عليا  وتتحملي  غضبي  وعصبيتي  عليكي... وما تتدنيش  أوامر  تاني  ابدا  ماشي  اتفقنا) 


ضحكت  لاول مره  منذ  شهور... لم  تكتم  ضحكتها... ركضت   لحضنه  وأرتمت  بقوه  لتأنبه... ضمها  طويلاً 


وحمد  الله  ف  سره.... نظرت  له  وقالت  بضحك

(ده  مش معناه  اني  سامحتك  يا  أستاذ... بس  انا  موافقه  نكمل  سوا.. عشان  انا  تعبت  من  العياط  والقهره) 


(الحمد لله   يعني  هتسكتي  وتحضري  لنا  الأكل) 


اؤمت  له  وهيه  تبتسم... قال  وهوه يخرج

(ماشي  يا  قلبي  انا  رايح  اغير  عقبال  ما  تخلصي) 


اؤمت  له  وأستدارت  للموقد  تشعله  من جديد.. نادي  عليها  وهوه  عند  باب المطبخ


(بطه) 


نظرت  له  بتساؤل

(هتنتمي   ف حضني  النهارده) 


ابتسمت  بخجل... ركض  إليها  حملها   من  جديد... تعلقت  بكتفه  بعد  ان  ضربته  بغيظ  ع  ظهره


عاتبته  من جديد... وتصالحا  من جديد.. وعادا  يتشاجرا  ع  اتفه  الأسباب... لكنه  لم  يخلف  بوعده  لها


اصبح  رجلا  حنونا... يستمع  لها  ويحترم  رأيها.. ولم  يفكر  يوما  بأذيه  اي  شخص من جديد  ... لكنه  لا يسامح... من  يتجاوز  الحدود  معه... 


سعد  كان  كشقيق  له  هوه  ويوسف...اصبحا  اصدقاء مقربين... يوسف  لم  يظلم  احدا  بعد  ما مر  به


كان  يساعد  من يحتاج  مساعده  من  جيرانه... وهذا  ما ادهش  الجيران  جميعاً.. كان  يعود  من  عمله  هوه  و وعد


ويوضبان  عش الزوجيه  ويقومان  بدهانه  من جديد  وشراء  الاثاث  اللازم  ليبنوا  معا  عشهم  السعيد


سعد  عاني  ف   ايام  و  فرح  ف  ايام  وتشاجر  مع  رحمته  ف ايام  اخري..لكنه   لم  يحاول  ان  يقسو


عليها  ف يوم  حتي  لا تتركه  من جديد...مرضها  لم  يقف  عائقا  ف  حياتهم  إلا  قليلاً....أذا  اغضبها  لم  يتركها  غاضبه  منه..ولا  يبعدها  عنه...لكن  مرضها


كان  يرحمه  من  غضبها  معظم الوقت...كانت  له  حسناته  كما  له  سيائه


مرت  أيام  جميلة  أحياناً...قاسيه  أحياناً...لكن  تلك  هيه  الحياه  لا  تستقر  ع  وضع  وإلا  اصبحت  ممله  لا تطاق


اقام  يوسف زفاف  ضخم  ف  منطقته...حضره  جميع  اهل المنطقه  ووقفوا  بجوار  العروسين  كأهل  لهما


وخاصا  سعد  ومحمود....اللذان  اصبحا  اخوه  واصدقاء

والزوجات  أيضاً  اصبحوا  صديقات  مقربات


تحسنت  الحياه  اكثر  عندما  انجبت  فاطمه  تؤام...سعاده  محمود  لا  توجد كلمات  لوصفها


كان عطوفا  حنونا  ع طفليه...تغير  الطيب لقاسي  ثم  عاد  رجلا  جديداً...وأبا  حنونا..وزوجا  محبا


وسعد  انجب  فتاه  ولا أجمل...سعدت  عائلته  كلها  بهذه  الملاك  الصغيره...وأصبحت رحمه  عند  الجميع  أختا  وأبنه  وزوجه  ...وأخيراً  عوضها  الله  بما حرمت  منه  سنوات طويله


يوسف  لم يخلف  وعده  مع  وعد...كلما  دقت المشاكل  بيتهم...كانوا  يتعاملان  معها...كي  لا يغرقوا  ف فخ  المشاكل الزوجيه  المعتاده


كان  يأخذها  معه  لصاله  الرياضه  (الجيم) ..ويعاملها  كصديق..أحياناً  بقسوه  وأحياناً  بلطف


لكنه  لم  يحاول  أغضابها..كان  يخشي  خسارتها..اصبحوا  فريقا  ممتازا  ف  العمل  والقبض  ع المجرمين


وأيضاً  ف بيتهم  يصبحا  زوجان  متحابين  يحترمان بعضهم   ويستمعان  لبعض  ولا  يحاول  أحدهم  فرض  سيطرته  ع الأخر


وهذا ما يفترض  به  ان يحدث....مهما كان  الرجل  او  الفتاه  قبل الزواج  يجب  ان يعلما  ان  الحياه

الزوجيه  تختلف  عن  حياه  العزوبيه


إذا  لم  يتخليا  عن  كبرياءهم  و عنادهم...وشخصيتهم  المنفرده...ويضع كلا منهم  حياه  حبيبه  وسعادته  وراحته

امام  عيناه  ومحط  اهتمامه


ستظل  الحياه  الزوجيه  قاسيه...يهرب  الحب  من  النافذه  بعدما  يدخل  الزواج  من الباب


وتستمر  المعاناه  بين الطرفين  ويدفع  ثمنها  صغارهم..وتنتهي  نهايه  مأسويه  كما  هيه  حال  معظم الزيجات


ليس  من  المحرمات  او  الغير  أخلاقي  ان  يصارحا  الزوجين  بعضهم  بما  يكتم  قلبيهم  من  مشاعر  مختلفه  حلت  بهم...يمكن  للطرفين  حل  المشاكل  بينهم  بالكلام 


ويجب ان لا يتوقفا  عن  كلمات  الحب العذبه...ف الكلمات الجميلة  تشفي  القلب العليل  وتريح  القلب  والأعصاب

وترسم  البسمات  ع الوجوه الحزينه.......


💝💝💝.أحبكم  ف الله  أخواتي  الأعزاء💝💝💝


***********   تمت بحمد الله************

     الرواية الجديده لكاتبه فريده احمد 

الوجه الآخر للقمر 

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