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رواية موعد في المساء الفصل الحادي والعشرون والثاني و العشرون

 

#فريده_احمد_فريد

وعاد ف المساء 

الفصل الحادي والعشرون....... 

المجد للقصص والحكايات 

عاد  محمود  لشقته  وهوه  سعيد... كاد  ان  يطير  من السعادة... دخل  شقته  ونادي  عليها  بصوت عالي 


(بطااااااا... بطوطه  انتي  فييييين... بطااااااا) 


وجدها  تجلس  ف  غرفته   وحقيبه  ثيابها  بجوارها... لم  يلاحظ  حقيبه  الثياب  بسبب  سعادته


ركض  اليها  وأوقفها  ع قدمها  وقال  بسعادة  لا توصف

(بطه... انا  طلعت  بريئ... عبير  عايشه... انا  ما قتلتهاش  الحكومه  ما بتدورش  عليا  يا  بطه... انا  حر... انا  حر  يا  بطه  انتي  سامعه) 


نظرت  له  بعينان دامعتان... تعجب  بشده... ورآي  حقيبتها  قال  لها


(ايه  دي... مالك  يا فاطمه.. حصل ايه... انتي  مش  سامعاني  بقولك  انا  بريئ  وايه  الشنطه  دي) 


دفعته  بعيداً   وقالت  بأشمئزاز

(انت  كداااااب.... انت  راجل  حقير  يا  محمود... بتقولى   انك  بريئ.... انت  كدااااب... من  شويه  منصور   جه  سأل عليك... جاي لك  عشان  تروح  تخطف  معاه  ناس  تبيعوها... انت  مجرم... سفاح... انت... انت  اللي زيك  خساره  فيه  الهوا  اللي  بيتنفسه) 


(بطه  انتي  اتجننتي... انتي  بتقولي ايه) 


(بقول  اللي  سمعته.... الحقير  اللي  زيك  جه  وقالي  انك  لسه  شغال  معاه.... وان  حضرتك   بتبلطج  ع الناس  وتخطفهم  معاه  ومع  الاشكال  الزباله  اللي  زيكوا.... منك لله  يا محمود... بتخطفوا  الناس  عشان  الفلوس... وصلت  بيك  القذاره  انك  تعيش   ع دم  الناس... ليييييه... ليه  يا  محمود  لييييه... كدبت  عليا  وعيشتني  معاك  ف  الحرام... أكلتني  لحم و دم البشر  ليه... انطق.. رد  عليا.. ليه) 



(كفاياااااا... كفايه  بقا... انا  استحملتك  كتير  بس  كفايا... انا ما بقتلش  حد... انا.. انا  عملت  كده  عشان  عايز  اعيش... انا  معرفش  الناس  اللي  منصور  بيخطفها  دي  بتروح  فين  ولمين... انا  مش بقتلهم  بأيدي) 


(اه  مش  بتقتلهم  بأيدك  بس  بتسلمهم  لعشماوي  بأيدك... انت  زي  المرتزقه  اللي  بيقتلوا  الناس  ويقولوا  ربنا   اللي بيحاسبهم  احنا  بس  بنوصلهم  ليه  صح.... ازاي  قادر  تنام  بليل.... ازاي  عايش  مع  نفسك... ازاي  بتبص  لوشك  كل يوم  ف المرايا  وانت  سبب  ف موت  وهلاك  ناس.. بشر  زيهم زيك... ازاي  يا محمود  يلي  اتظلمت  من ابوك  ومراته  ومراتك  والناس... إزاي   تأذي  يلي  أتاذيت  وعارف  الأذي  والظلم  وحش  إزاي... ازاي  هان  عليك  تأذي  حد  انت ما تعرفهوش  وما تعرفش  عايش  إزاي  ووراه  إيه.. انت  يا  محمود   مسخ... وحش  آدمي... انت  غلطه  ف حياتي  عمري  ما هسامح  نفسي  عليها... طلقني... طلقني  ولو  عندك  ذره   كرامه  ودم... روح  اقتل  نفسك... ولع  ف نفسك   يمكن  ربنا  يسامحك  رغم  ان  المسوخ  اللي  زيك  ربنا  حتي  ما  بيبصلهومش... اللي  زيك  ربنا  بيختم  ع قلوبهم  وما بيتقبلش  منهم  دعاء  ولا  صلاه... حسبي الله ونعم الوكيل فيك   يا  محمود... حق الناس  اللي  ظلمتها  هيفضل  ف  رقبتك  ليوم الدين... طلقني.. سامع  طلقني) 


تركته  و ذهبت... لكنه  ركض  خلفها  .. مسك  يدها  دفعته  بعيداً... قال  لها


(وانا  مش  هطلقك  يا  فاطمة... انا  غلطان  انا  بعترف  اني  غلطان... بس  ... بس  انا  افتكرت  اني  مجرم  ومحكوم  عليا بالموت... كنت  فاكر  ان  كده  بأخد  حقي  من  الدنيا... بطه   انا  بجد  عايز  اتغير... بعد  ما  عرفت  اني  بريئ  حاسبت  نفسي... وأتفقت  انا  وسعد  اننا  نساعد  الظابط... اديني  فرصه  .. خليني  اصلح  الغلط  اللي  غلطته... هساعد   الظابط  يقبض  ع  منصور  واللي  مشغله.. وهساعده  يوقع  العصابه  كلها... بس  يا  فاطمه  اديني  فرصه  وما تدعيش  عليا) 


(كدااااب... وانا  ما يهمنيش  انت  هتعمل  ايه... طلقني... انا  مش عايزه  اشوف  وشك  تاني  ف حياتي) 


محمود  جن جنونه... رآي  انها  تبالغ كثيراً   ف رده فعلها..قال  وقد  عاد  لجبروته


(انا  مش هفضل أتحايل  عليكي..... واقولك  حاجه... انا  هخلع  من الليله  دي  كلها... انا  راجع مصر  دلوقتي... ولا  هساعد  حد  ولا  هشتغل  مع  منصور... انا  هرجع  لشغلي  وبيتي  وحياتي... وهأخد  حقي  من الخاينه  ... ومن  مرات ابويا... هرجع  اعيش  زي  ما  كنت... بس  هعيش  بكرامتي  ف  حتتي... عايزه   ترجعي  معايا  اهلا وسهلا... مش عايزه  براحتك... اوعي  تفكري  اني  عشان  بقولك  كده... يبقا  انا  خلاص   هموت  عليكي  لاء  يا ماما... عايزه   تسبيني  وتطلقي   طظ... مليون  طظ  فيكي... هطلقك  واتجوز  عليكي  واحده  تليق  بيا... مش  حته  بت  لا شكل ولا  منظر  الرجاله بتتريق  عليها... دا  انا  معيشك  معايا  شفقه  عليكي... انتي  مش عارفه   انتي  متجوزه  مين... دا  انا  اجمل  ست  ف الدنيا  تتمني  تراب  رجلي... انتي  هبله  باين عليكي   ولا إيه... عايزه  تمشي... اتفضلي.. غوري  ف ستين  داهية... الباب  يفوت جمل) 


نظرت  له  والحسره  والصدمه  والأنكسار  يملؤ عيناها... اخذت  حقيبتها  و خرجت... خرجت  وهيه  تلعن  حظها


ونصيبها  الذي  اوقعها  مع  رجل  مزدوج الشخصيه.. كاذب.. غشاش  مثله... كيف  وقعت  ف حب  رجل  مثل هذا؟؟؟؟ 


عادت  لعمارتها  ف  منطقتها  القديمه... دخلت  بيت  ابيها.. المنزل الذي ترعرت  فيه


اطلقت  العنان  للبكاء  والصراخ  ف  غرفتها  القديمة.. كم  خططت  لتلك  الأمسيه  معه... كم  تمنت  عودته  باكرا


لتخبره  انه  سيصبح  أب... لكنها  الان  تلعن   حظها  اكثر  من اي  وقت  مضي... ما  ذنبه  هذا  الطفل  ليولد  دون اب


فاطمه  فقدت  وعيها  ع  الفراش  من  كثره  البكاء  والحزن... لم  تجد  مفر  من  حياتها  التعيسه.وحظها  الغير قابل  للتعديل

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ف المديرية... يوسف   تم  التحقيق  معه  بجديه  كأي مجرم  مدان... تم القبض  عليه  بتهمه  التواطؤ


مع عصابات   مافيا  تتاجر  ف السلاح  وتجاره الاعضاء.. وجدوا  ف رصيده  مبالغ  ضخمه  غير معلومه المصدر


ووجدوا  خزينه  امان  بأسمه  وجدوا  فيها  وثائق  رسميه  لشراكته   مع شركات  وهميه  تعمل  ف الاستيردات  و التصدير


وبعد تتبع  تلك  الشركات  وجدوا  مقرها  التابع  لرجل الأعمال  المطلوب  دوليا... إبراهيم  الحسيني


الذي  قبض  ع حاويات  ف الميناء  تحمل  اسلحه  خطيره  وتم  إصدار  قرار بالقبض عليه  حيا او ميتا


ف تم التحقيق  مع يوسف  ع هذا الاساس... لكنه  انكر  معرفته  بكل  هذا  وظل  يقسم  لهم  بأنه  كان  مكلف


بتلك  القضيه  منذ  شهور  عده... لكن  بطبيعه الحال  لم  يصدقه  احد... و قامت النيابه  بحبسه  اربع ايام  ع ذمه التحقيق


عاد إلي الحجز... لكن  نظرا  لكونه ضابط شرطه... حجز  ف حجز  انفرادي.... لم يصدق نفسه  ... كيف وصل لهذا


وإيمان... هل هيه  حقا...؟؟ كيف؟؟؟ اسئله  قاتله  تدور  وتدور  ف  عقله.... لم  يلاحظ   باب  الحجز  عندما  فتح


دخلت إيمان  ووقفت  أمامه  بشموخ... قالت له بسخريه(توسيييييف... ازيك  يا  يويو) 


نظر  لها   غاضبا... ركض  إليها  ومسك  يدها  وهزها  بعنف  وهوه  يصرخ  فيها


(إيمان... انتي  إيمان... إزاي... وبتعملي ايه هنا... انا  مش فاهم حاجه... اتكلمي  قبل  ما  اتجنن... انطقي) 


دفعت  يده  بعيداً   عنها... و لوت  ذراعه  خلف  ظهره  ف حركه  سريعه... صدم  من  حركتها  المدربه... تركته  و دفعته  بعيداً.. وقالت  له


(صحيح   انت  غبي... كل  ده  ولسه  ما فهمتش) 


(افهم ايييييه) 


(تفهم  ان  انا  اللي عملت  فيك  كده... انا  اللي  جبتك  هنا  يا  يوسف  بيه) 


نظر  لها  مصدوما.... شعر  انه  سيجن بالفعل... نظرت  له  وأكملت  بغضب


(انا  اللي   ورطتك.. ولبستك  التهم  دي  كلها... انا  اللي  عيشتك  متحسر  ع حبيبه قلبك   إيمان.... انا  اللي  عملت  كل  ده  يا  يوسف بيه) 


(ليه... إزاي... انا  مش فاهم... طب  عملت لك  ايه  عشان تعملي فيا  كده... وبعدين   انتي  مين) 


وقفت  بشموخ  أمامه  وقالت  وهيه  تشير  ع رتبتها  ف زيها  الميري


(النقيب  وعد  عزت..... قوات خاصه.... ومش بس  كده) 


اقتربت  منه  وهمست  

(انا  برضو  الخاين  اللي  الوزارة   قالبه  الدنيا  عليه... انا... انا  يا  يوسف  اللي  مشغله  نص  تجار  البلد... مخدرات  ع سلاح... بس  شهاده لله... ماليش  ف  تجاره البشر.... مش  لعبتي.... بس  عارفاهم  ... وعارفه  مين  وراهم... وصدقني  هتتصدم  لو  عرفت) 


يوسف  كأنه  يتلقي  رصاصات  متتاليه  من  مدفع  آلي... قال  لها  بوجع


(أنتي... انتي... طب  ليه... وانا... دخلتي  حياتي  ليه... و.. و  الاغتصاب... اللي  أغتصبوكي... دول  برضو   كانوا  تبعك) 


قالت  بسخريه 

(كله  كان متخطط  له  بالورقه والقلم... انا  نصبت  لك  الفخ  من  سنين  وانت  بكل  شطاره   وقعت  فيه  زي  الفأر  ما  بيلبس  ف المصيده... وقبل  ما  تسأل تاني  ليه  وازاي  واشمعنا... نبتدي  ب إزاي... مفيش  يا  سيدي... انا  دخلت  ع ابوك  ومثلت  عليه  دور  الهبله  المسكينه  وهوه   شربها.... دخلت  بيتك  وعملتهم  عليك... بس  انت  طلعت  ناصح  و طردتني.... بعت لك  اللي  يسهلها  عليك... بعت لك  مرشد  من  رجالتي  وهوه  اللي  قالكم  ع  وكر  اشجان... وهنا  جه  دوري  ف  المرض  والرقده  ف  المستشفى   والغيبوبه  المصطنعه... طبعاً   كل  ده  مترتب له  يا  باشا... والباقي  بقا  انت  عارفه... وآه  قبل  ما انسي... انا  كنت  بسمعك  وانت بتتفق  مع  صحابك   عليا..اصلي  حطيت لك  جهاز تتبع  وتصنت..... يعني  خاطرت  بشرفي  معاك  وانا  عارفه  اني  مش  مراتك... بس  انا  كنت  واثقه  انك  مش  هتلمسني... لأنك  مغرور.... وشايف  انك  احسن  مني  ومن  اي  حد... ومفيش واحده  اتخلقت   تملي عينك... مش ده  كلامك  يا  باشا) 


قالتها  بسخريه عارمه... نظر  لها  بأحتقار  وقال

(شرفك... وانتي  اللي  زيك  عنده  شرف... كملي  يا مؤلفه  يا مخرجه... كملي  الفيلم  اللي  عملتيه  عليا... قولي لي  الدافع  بتاعك  يا  حضره النقيب) 


نظرت  له  بغضب  وقالت  بصراخ

(انت  عارف  الدافع  يا  يوسف... إيمان..أختك) 


اتسعت عيناه  ع وسعهم... اكملت  بغضب

(فاكر  المسكينه  دي... فاكر  انتحرت  ليه... او  امتنعت  ع  الأكل   بمعني  اصح  ليه) 


(ايوا  طبعاً   فاكر... إزاي   انسي  يعني... زعلت  عشان  ضربتها... قعدتها  من  جامعتها  عشان  مشيت  مع  عيل  زباله  وضحك  عليها  واتجوزوا  عرفي  من  ورانا... فاكر كل  حاجه  وعمري  ما نسيت) 


(اهوه  الزباله  اللي  بتقول  عليه  ده... يبقا  اخويا  الصغير.... اخويا  اللي  حبسته  ظلم... اللي  خليت  الامنا  بتوعك  يضربوه  لحد  ما  مات  المسكين  من  كتر  الضرب... اخويا  اللي  جريمته  الوحيده   انه  حب  أختك... حبها  من  كل  قلبه... وعمل  الأصول  وجه  لحد  عندكوا... وانت  طردته  زي  الكلب... والمسكينه  اختك... قالت له  نتجوز... نتجوز  من  وراهم  وهوه  رفض... لكنها  كتبت  ورقتين  عرفي  وقالت  هتواجهكم  بيهم  عشان  تقبلوا  بالأمر الواقع... بس  انت... انت  ما  أديتش  حد  فرصه  يقولك  الحقيقه... ظلمت  اخويا  وظلمتها  وقتلتهم  الاتنين  عشان  رفضت  تسمع... ودلوقتي   بعد  اربع سنين  يا  يوسف  انت  اللي  محدش  هيسمعك) 


كانت  تصرخ  بحرقه  وقهر... تبكي  دموع  حاره  كبركان  ملتهب... سندت  ع  الحائط   وأكملت  بمراره


(كنت  لسه  متخرجه  جديد... ومتعينه  ف  محافظه  بعيده... مكنتش  أعرف   اي حاجه... جيت  اجري  ع ملي  وشي  لما  امي  قالتلي  اخوكي  مات... مات  ف القسم... مات  المسكين  عشان حب.... انا  اسودت الدنيا  ف وشي... مقدرتش  اخد  حق  اخويا  بالقانون... محدش  من  الامنا  شهد  عليك.... ومحدش  اصلا  حقق  معاك... قالوا  ف المحضر  انها  كانت  خناقه  بين  المساجين  وهما  اللي  قتلوه... بس... بس  انا  استجوبت  مجرم  منهم  بطريقتي  وهوه  قالي  الحقيقه... الحقيقه   اللي قتلتني... دبحتني... وهيه  ان  الحكومه  اللي  انا  اقسمت  للولاء  ليها  وأموت  فدا  الوطن  والواجب  ... وأضحي  بروحي  وأحمي  شريكي... كل دول  مقدروش  يجيبوا  حق  اخويا.... بس   المجرم ده  قالي  ان  انت  السبب... قالي  انك  وصيت  عليه  ينضرب  ليل نهار... يتحرم   من  الاكل  والزيارات... انت  يا  يوسف  اللي  قتلته... وانا.. انا  سمعت  كلام  المجرم  لما  قالي  اللي  اتأخد  بالقوه  ما يرجعش  غير بالقوه... عرفني  ع  معلمه... اتفقت  مع  تاجر  الموت  اني  ابقي  ظابط  فاسد  واساعده  ف التهريب.. واكون  عينه  ف الحكومه... اشتغلت  لحسابه  سنين  ووقعته  ف الآخر   عشان  اترقي  و فعلاً   ده  اللي  حصل... بس  انا  بقيت  عميل مزدوج... اشتغلت  ف السلاح  لحسابي... وعملت  امبراطوريتي  الخاصه... بقيت  من  ناحيه  اشارك  الكبار  ومن  الناحيه التانيه   اوقعهم  واترقي  وأعلي... عملت  كل ده  عشان  اوصل لك.. كان  ف نيتي  ااجر  حد  يخطفك  واقتلك  وادفنك  ف الصحرا... بس  قلت  الموت نهايه  سهله  اوي  ليك... ف  خططت  ان  ألبسك  جنايه  زي  دي... وتكمل  باقيه  حياتك  ف السجن  ... وتعيش  مذلول  مكسور... فكره  البت  المتسوله  اللي  تخليك  تحبها  انا  خدتها  من  فيلم  الصراحه  ومثلتها  عليك  وع  الغلبان  ابوك... وع  فكره   انا  حبيته  بجد.. وانت  ما تستاهلش  اب  زيه... الله  يرحمه... عاما... انا  دلوقتي   قلت لك   الحقيقه  كلها  يا  باشا... وجايه  دلوقتي   عشان  اتشفع  فيك  وأشفي  غليلي  منك... وكده  خلص  دوري  يا يوسف بيه) 


وقفت  ع  قدمها... أخذت  نفس  طويل  ونظرت  له  بحزن... وهمت  بالخروج... لكنه  قال  لها


(مش قادر  اصدق... عملتي  كل  ده   طول السنين   دي... عشان  عيل  شمام  رد  سجون  وهمك... قالك  كلمتين  من  غير   اي  دليل... وانتي  بكل بساطه   صدقتيه... وعد  انا  ما قتلتش  اخوكي... الامنا  فعلا  بيضربوا  المشاغبين  ولحد دلوقتي   بيحصل ده... بس  فعلاً   ف اليوم  ده  حصلت خناقه  كبيره  وناس  كتير  اتصابت  بس  اخوكي  معرفش  يدافع عن  نفسه   ومات  غلط... مات  وسطهم... مش  انا  اللي  قتلته... خليتي  الغضب  يعمي عنيكي  وعيل  زي  ده  يسوحك... معقوله   انتي  تشتغلي  ف السلاح  والمخدرات  مع  اكبر مجرمين  ف بلدك  عشان  تنتقمي  مني... طب  ياريتك  كنتي  سلطتي  عليا  وقتلتيني... ولا  انك  توسخي  نفسك  مع  ناس  زي  دي... إزاي  يا  وعد  تتعاوني  من  ناس بتتاجر بأرواح الناس.. ازاي) 


(لاء  يا  ناصح... ما  انا  برضو   اللي  وقعت  الحسيني... ابو فروه  ولا  نسيت  اوام... وهوقعهم  واحد  ورا  التاني... انا  زي  ما  خربتها  انا   برضو اللي  هعدلها... وكده  هكون  ضربت  عشرين عصفور  بحجر  واحد  بس  صدقني  انت  أهم  عصفور  فيهم  واوعي  تفكر  اني  صدقت  كلامك  الاهبل  ده... لاء  يا  باشا  انا  مش  تلميذه  وعارفه  انك  مؤذي) 


(وعد  لو  مش  عايزه  تصدقيني  براحتك... بس  تقدري  ترجعي للأرشيف  وتأخدي  اسم  كل  المساجين  وقتها  وتروحي  تسأليهم  واحد  واحد... ولو  قالوا  كلام  غير  كلامي  يبقا  انا  استاهل  اللي  عملتيه  فيا... ولو  طلع كلامي  صح... مش  هقولك  خرجيني  زي  ما  ورطيني.. لاء... هقولك  اقضي ع  عصابه  الحسيني  وكل  عصابه  تعرفيها... وابعدي  عن  التجاره  دي... وخليكي  ظابط  عنده  ضمير  و اعملي  الصح  يا  وعد... بس... بس  انا عايز  اسألك  سؤال واحد بس... انا  قلبي  ذنبه  إيه... ليه  علقتيني  بيكي... دا  انا  كنت  بموت  كل  لحظه... كل  ثانيه  بتعدي  عليا  كنت  بشوفك  وانتي  بتموتي  ادامي.. عارفه  كام  مره  حاولت  انتحر... عارفه  انا  كنت  هتجنن  ازاي  عشان  اخد  بتأرك... انا  هعيش  ازاي  بعد اللي  سمعته  ده... مش عارف  اقولك  ايه  يا  وعد... بس  قلبي  ما عملش  حاجه  عشان  يتعاقب  كده... تعاقبيه  بقسوه  اوي  كده.... ليه  يا  وعد  جبرتيني  أحبك  ليه) 


نظرت له  بصدمه   وذهول... لم تعرف  بماذا   تجيبه؟؟؟ نظرت  للأرض  بحزن... وخرجت  وهيه  تغالب  دموعها


دموع  لا تعرف  سببها... شعرت  بقلبها  يتمزق... بركان  مشاعر  حزينه  احتلتها  ولا  تعرف   لماذا؟؟؟؟ 

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ف فيلا  قديمه  ف المنصورة 

يجلس الحسيني  بكل شموخ  ع كرسي  ويضع  قدمه


ع وجه  رجل  من  رجاله....وجهه  مليئ بالكدمات  وأثار  ضرب  وتعذيب..... يبكي  الرجل  تحت  قدمه  ويقول  وهوه  يرتجف


(اقسم بالله يا باشا  ما خنتك... انا  كنت  مظبط  كل حاجه... معرفش  مين  اللي  وقعنا  او  مكنتش  اعرف  ... بس  انا  شكيت  ف  حد... فاكر  اليوم  اللي  كلمتك  وانا  ف اسكندريه... لما  اتفقت  مع  ظابط  الجمارك  اللي  هيسلك  لنا  البضاعه  ف المينا... اليوم  ده  انا  كلمت  الظابط  ده  ف  شارع  فاضي  ورا  مطعم... كنت  بتعشي  فيه... اتفقت  معاه  ع كل حاجه... بس  سمعنا  دربكه  فجأة... جرينا  نشوف  ف إيه... لقينا  بت  من اللي  شغالين  ف المطعم.... كانت  بتتصنت  علينا  يا باشا... بس  كدبت  ف وشنا  وقالت  انها  بتخرج  الزباله  من المطعم... وانا  و عبده  ما  حطيناش  ف  دماغنا  انها  بتكدب... لأني  شفتها  كذا  مره  ف المطعم... بس.. بس  ياباشا  انا  متأكد  انها  هيه  الجاسوسه... هيه  اللي  بلغت  عننا... وقالت  للحكومه   اللي  سمعته... ياباشا  انا  بقسم لك... اني  هجيبها  هنا  تحت  رجلك... واللهي  ياباشا  هجيبها  لك  واخليها  تعترف  قصادك) 


وقف  الحسيني  بشموخ... ونظر  له  بأحتقار  وقال

(ماشي... وانا   هديك  اخر  فرصه... ومش  هترجع  اسكندريه   لوحدك... انا  هروح  بنفسي... عشان  افهم  من  شريكي  مين اللي   وقع  اشجان... وجاب  اسمي  ف  الحوار... متنساش  ان  اشجان  تعرف  كل حاجه  عننا... ولازم  تموت  ف  الحجز.. وانا  مش  هعتمد  ع  شويه  عيال  خرعه  زيكم  تاني... انا  اللي  هخلص  نفسي... واللي  غلط  هيدفع التمن  هوه  وأهله  وكل اللي  وراه) 

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القلب  كم  هوه  غامض  هذا العضو النابض الذي  هوه  منفذنا  للحياه...كم  يتحمل  مشاعر  تفوق  الوصف


وايضا  كم  هوه  مخادع  أحياناً...يكابر  ويعاند  حتي  يغرق  ويغرقنا  معه...لما  لا  يصارحنا بالحقيقه  من البداية


لما يكابر عندما يتعلق  بأحدهم  ويتركنا  عميان  حتي  نفقد  هذا  الشخص..كم  انت  غريب  ايها  القلب


سعد  لم يعد  كما  هوه...من هذا  الرجل  ...لم  يعد  يعرف  نفسه...أصبح  مكتئبا  طوال الوقت...فقد  الأمل  ف العثور


ع  زوجته...ظن  انه  سيتخطي  هذا الألم  الذي  يعتمر  صدره...لكنه  كل  يوم  كان  يزيد  بقوه


لم  يكف  عن التفكير  فيها..ليلا  نهارا....ينتفض  جسده  وهوه  نائم  ليلاً  لمجرد  انه  يحلم  بها  تغرق...او  تسقط  


من  مكان  عالي...او  تستغيث  به  وهيه  تصرخ  باكيه...لم  يعد  يحتمل...لم  يظن  للحظه  ان  قلبه  سيعرف  طريقاً للحب


لكن  ما فائده  الندم  الأن...فقد  اصبحت  ماضي  ف  حياته  البائسة...فقد  اي  آمل  ف العثور  عليها


حاول  ان  يعود  كما  كان...سعد  الرجل  القوي...الذي  يهأبه  الناس  حتي  أخواته  الرجال...لم  يعد  هوه  نفسه


اتصل  ع محمود  يسأله  لما  أختفي  فجأة...لكن  محمود  صدمه  عندما  قال  له


(انا  رجعت  مصر  يا  سعد...طلقت  عبير  ورميتها  ف الشارع  بعد  ما  فضحتها...و خدت  حقي  من  كارم...ومن  كل  كلب  ذلني  ف  الشارع...ورجعت  شغلي  وحياتي)


(بجد...طب  ليه  يا محمود...ومنصور  سابك  ...بالسهولة دي  سابك  تمشي  بعد  ما عرفت  عنه  وعن  عصابته  كل  حاجه)


(يولع  منصور  ع  اللي  مشغلينه...سعد الليله  دي  مش  بتاعتي  ولا  دي  دنيتي...انا  رجعت  لحياتي  وراضي  بيها  اوي  ع  كده...وانت  لقيت  مراتك)


(لاء  يا  محمود...يظهر  اني ماليش  حظ  لا  مع الحريم  ولا  مع  الصحاب...مع  السلامة يا صاحبي  وخد بالك من نفسك...ولو  رجعت  اسكندريه  ف اي  وقت..افتكر  ان  ليك  صاحب  هناك  مديون لك  بحياته)


(لا مديون لي  ولا حاجه  يا  عم  احنا  خالصين  يا  سعد  وبعدين  ما احنا  هنفضل  صحاب...هفضل  اكلمك ع طول  ع الأقل.....اعرف  اخبار  فاطمه  منك)


(نهارك  اسود  يا محمود....انت  سبت  بطه  هنا)


(هيه  اللي  رفضت  ترجع  معايا...و مأفوره  اوي  ف حوار  منصور..و شغاله لي  ف الحلال والحرام   واللي  يصح واللي مايصحش.....حسستني  اني  متجوز  الشيخه  خضرا  وانا  معرفش...عاما...هيه  رجعت  بيت ابوها...ابقي  طمني عليها  وعليك  من وقت  للتاني...وخلي بالك انت كمان  من نفسك)


(حاضر  يا  محمود..مع انك  غلطت  غلطه  كبيره  انك  سبت  بطه...بعد اللي  انت  عملته  ف المنطقه  هنا  وهناك..وخلقت  لك  اعداء  ..بيتهيألي  ان  بطه  هيه  اللي  هتدفع  تمن  العداوه  دي  يا  محمود....بس  انا  مش  هسيبها...دي  جارتي  وبنت  حتتي  ومتربيين  سوا...ومش  هسيب  حد  يأذيها...يلا  سلام يا صاحبي)


أغلق  سعد  الهاتف  معه  وهوه  غاضب...لم  يرضي  بما  فعله  محمود  مع  فاطمه...لم  يجب  ان يتركها  وحدها  بعد  ان  أصبح  خارج عن القانون  ...وله اعداء  عده

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ف الجهه الأخري...محمود  دب  الخوف  قلبه...شعر  انه  تسرع  عندما  تركها  خلفه


لكنه  حاول  كبت  صوت  ضميره...واقناع  نفسه  انه  لا  يريدها...لا  يريد  أمرأه  تجادله  طوال الوقت


بل  يجب عليه  ان  يعيش  بحريه  ويبحث  عن  امرأه  تفهمه  وتستحقه...ويفخر  بالزواج  منها...وبناء  اسره  معها


حاول  بجهد  ان  يقنع  نفسه  بهذا...ويشعر  بالرضا...لكن  للقلب  كلام  أخر  رفض  العنيد  ان  يستمع  له


        يتبع  ف الفصل  22

#فريده_احمد_فريد

وعاد ف المساء 

الفصل الثاني والعشرون........ 


وتمضي الأيام  والحال  هوه الحال... يتمزق العشاق  والعند  يصاحب الأشواق 


يوسف  يتحطم كل يوم عن ذي  قبل... يدفع ثمن جريمه لم يرتكبها... ويعيش ف جحيم  مع قلبه  الذي  رفض ان يكرهها  حتي  بعد  ان  ظهرت الحقيقه


ينتظر  محاكمته  ف اي لحظه   وهوه  ع يقين بأن حياته  ستنتهي  ف  السجن.. وسط  المجرمين  الذي  وضعهم  بنفسه  فيه... سلم  لقضاء الله  و لم  يحاول


نفي التهم  عنه مجدداً... اثبتت  النيابه التهمه عليه  بسبب  صمته... وتم  تحديد  موعد  لجلسته ف الغد

............................ 

سعد  أفني  وقته  كله  ف العمل.. كان  يصب  غضبه  ع العمل  فقط... لم  يعد  يجالس عائلته  مثلما  كان


ذات  ليله  تشاجر  مع  أخواته  و أنبهم  لأن  لهم  دور  ف  خسراتها... لم  يعاملوها  يوماً   برفق.. ولم  يشكرها


احدهم  ع  تعبها  وشقائها  لأجل  راحتهم... تصدعت  العلاقه  بين  الأخوات  فتره طويله... لكن  سعد  لم  يهتم


لهم... ولا لأي  شىء  اخر... فقد  الرغبه  ف  الأستمرار.. شعر  انه  يعد  أيام  حياته  بالساعه... كي  تنتهي  وينتهي  معها  حزنه  الدائم  ووجع  قلبه  المستمر

....................... 

محمود  لم  يكن  أفضل  حالا... بالرغم  من  تحسن  حياته  بشكل  كبير.... ظن  ان  منصور  سيحاول  ان  يجده


لكن  لم  يسأل  عنه  أحداً  .... أراد  اكثر  من  مره  ان  يتصل  بها... ان  يسألها  عن  حالها... لكن  كبرياءه


رفض  ان  يخضع  لشوقه  لها... لم  يكف  عن  تذكرها... كم  كان  ينهشه  قلبه... وهوه  يكابر... ذات ليله  ف  موقع البناء


الذي  يعمل  فيه... ظهرت  غرام... مهندسه  حديثه  التخرج... فتاه  جميله  يافعه... أعجبت  به   منذ اليوم الأول


تلك الليله  صارحته  بمشاعرها  تجاهه... لم  يعترض  محمود  ع  دخول  غرام  لحياته... وجد  نفسه  انه  يستطيع 


ان  يتخطي  ذكري  فاطمه  وان  يتزوج  وينشأ  الأسره  التي  يتمناها... لكنه  رغم  هذا.. لم  يشعر  بأي  موده


او  أعجاب  لغرام... رغم  جمالها   وذكاءها... وتعليمها  العالي  مثله.... وجد  نفسه  يطلب  منها  الزواج


شعر  انه  اذا  اقترب  منها  بشكل  آخر... سيحبها  وينسي  الماضي   بما  فيه... وافقت   غرام  وكانت  ف  قمه  السعادة 


اتفقوا  ع ميعاد  قريب  لعقد قرآنهم... و أتمام  الزواج... ورغم  كل  هذا  لم  يشعر  محمود  بالرضا  ولا  الراحة 

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سعد  كان  ف  ورشته  يعمل  ككل يوم... فجأة   رن  هاتفه... وجد  المتصل  رقم  غريب... رد  بلامبالاه


(مين) 


الطرف الأخر(استاذ سعد مصطفي  معايا) 


(ايوا  مين) 


(انا  نعمه حسن... من  مستشفي  الخانكه... حضرتك  جوز  رحمه) 


سعد  أسقط  ما  بيده  ومسك  الهاتف  بكلتا  يداه  وقال  بلهفه


(ايوا... ايوا  انا  سعد  جوز  رحمه... هيه  عندك... مراتي  عندكوا) 


(ايوا  يا  استاذ  سعد  وهيه  تعبانه  جداً... والدكتورة   اصرت  اني  اكلمك) 


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ف  إحدي  غرف  العاملين  ف مشفي الخانكه... تجلس  رحمه  ع  الفراش  وتحاول   ان  تنهض  واقفا


لكنها  ضعيفه  جداً... هزيله  جداً... كأنها  لم  تتناول  اي  طعام  منذ  أيام... فجأة... دخل  سعد  عليها   ورآي  شكلها  المخيف  بسبب  التعب


تسارعت دقات قلبه...شعر بالحياه تتسرب إليه  من جديد..

ركض  إليها  كالمجنون.... وضمها  بقوه... بشق  الأنفس... حاولت  دفعه  بعيداً   عنها   وهيه  تصرخ... لكنه  وضع


يده  ع  فمها... وقال  بحنان

(شششششش... انا  سعد... انا  جوزك  يا  رحمه) 


(جوزي... جوزي  مين... انا  معرفكش) 


(عارف... عارف  ان  عندك  زهايمر   وحالتك  متدهوره... الدكتوره  قالت  لي  ع  حالتك... وقالت  لي  انك  شغاله  هنا  طول  الفتره  اللي   فاتت دي... بس  يا  رحمه  انا  جوزك... اقعدي  وانا  احكي  لك  كل حاجه) 


رحمه  نظرت  له.... نظر  لها  بعشق  وأشتياق  لايوصف... لكنه  رآي  ع  صدرها  ورقه  معلقه  ف  دبوس... سألها


(ايه  الورقه   دي  يا  رحمه) 


نظرت  للورقه  بأستغراب  كان  مكتوب  عليها  أقرأيني

مسكت  الورقه  وفتحتها... نظر  سعد  معها  لكنه  فتح


عيناه  خائفا... كان  مكتوب  بالورقه...ابحثي  عن  مذكراتك  تحت  وسادتك...فعلاً


مدت  يدها  تحت  الوساده  اخرجت  أجنده  حمراء...سعد نظر  للأجنده  برعب...لكنها  قرأت...لم  يحاول  سعد  إيقافها...كان  مكتوب  ف الأجنده


من  هيه  .. و انها مريضه  زهايمر...و  متزوجه  وزوجها  خانها  مع  زوجه  أخيه... وهيه  حامل  منه  وهوه  لا  ينجب... كان  مكتوب  كل شىء   مرت  به  حتي  الليله الماضيه


وقعت  الأجنده  منها... ونظرت  له  وعيناها  كالشلال  الجاري  ع وجهها  الأصفر  ... كادت  ان  تسقط  ارضا  من


كم  الصدمات  المتتاليه  التي  قرآتها.... لكن  سعد  مسك  يدها  يسندها  دفعت  يده  بعيد  وصرخت  فيه


(انت... انت  خنتني  مع  مرات اخوك... انا  شفتك  بعيني  صحيح... وانا... انا  خنتك  يا  سعد... فهمني... طب  ليه... طب  انت  جيت  لي  هنا  لييييه) 


(اهدييييي.... بالله عليكي   أهدي   وانا  هفهمك  كل حاجه... انتي  كل  اللي  قرتيه  صح... بس  انا  عندي  تفسير... انا  لا  خنتك... ولا  انتي  خنتيني.... انا  هحكي  لك.  .... انا  ما كدبتش  عليكي  لما  قلت  لك  قبل  كده  ان  ريحانه   بتحبني... واتجوزت   اخويا  عند  فيا... ريحانه   بت  داهيه... بنت  حرام  مصفي... وهيه  مرات  اخويا... حاولت  تغويني  عشان  أحمد  كان  متبهدل  من  المخدرات... ف  الهانم  كانت  بتلعب  ع الحبلين... عشان  تفرد  نفسها  ع البيت  كله.... ف  ليله  سوده  كنت  بتخانق  ف  الشارع... وحصل  ضرب  نار... وصاحبي  وقف  ادامي  وخد  رصاصه  بدالي  ومات... انا  كنت  منهار  يا  رحمه... انتي  لو  تفتكري  ايامنا  زمان.

المجد للقصص والحكايات 

.. هتفتكري  الحوار  ده... محمد  مات  ع  ايدي  وبسببي... انا  من  حزني  عليه  انعزلت  وقعدت  فتره  لوحدي  ف الاوضه  اللي  ع  السطح... كنت  بشرب  ومبهدل  نفسي  بالمخدرات  عشان  انسي... وف  ليله  طلعت  لي  ريحانه   وف  ايدها  كوبايه  قهوه... خدتها  منها  وبعد  ما  شربتها  ما بقتش  حاسس  بنفسي... صحيت  لقتني  نايم  مع  ريحانه   ف  نفس  السرير... ريحانه  خدرتني  ب أبتريل  عشان  تجبرني  اعاشرها... وفعلاً   نمت  معاها  وانا  متخدر... والهانم  صورتني  عشان  تبتزني... كانت  عارفه  اني  بحب  اخواتي  وأموت  قبل  ما  أذي  حد  فيهم... فضلت  تذلني  بالفيديو  ده  عشان  افضل   ف  صفها... حاولت  بعد  كده  تجر  رجلي  عشان  أعاشرها  تاني  وانا  كنت  بتهرب  منها  خفت  اقول  لأحمد  لأخسره... لان  احمد  كان  مجنون  بيها... بس  قلت  لأبويا... وبكده  ريحانه   كانت  ماسكه  علينا  فيديوهات  تودينا  ف داهيه  انا  وابويا... فاكره  لما  جبرتك  تروحي  معانا  لأبوها... ده  كان  بسبب  الفيديو  بتاعي.... هيه  هددتني  يا  رحمه... لو  ما  عاملتكيش  وحش  وكرهتك  فيا  وف  عشيتك... هتفضحني  و تخليني  انا  واخويا  نقتل  بعض.... المهم  يا  رحمه  انا  تعبت  وزهقت.... مبقتش  قادر  ابص  ف وشك... كنت  بتجنن  لما  اشوفك  ادامي  و محرم  عليا  اني  اخدك  ف حضني  ريحانه   كانت  بتراقبني... وف  يوم  اسود  كنت  متخانق  معاكي  فيه... كنت  مخنوق  ومش  طايق  نفسي... احمد  خد  باله  ودخل  ورايا  اوضتي... لقيت  نفسي  بحكي  له  ع كل حاجه   من  الاول خالص... عيطت  لأخويا  زي  العيل  الصغير... كنت  خايف  اخسره  او  نتخانق  مع  بعض  وواحد  فينا  يقتل  التاني... بس  احمد   صدقني  وطلب  مني  اوريه  بعنيه... واسجل  لها  زي ما سجلت  لي  ونهددها  نأخد  كل  فيديوهات   ابويا  والفيديو بتاعي   قصاد  الفيديو  بتاعها  اللي  انا  هصورها  وهيه  ف حضني  فيه... وفعلاً   ف الليله  الزفت  دي.... طلعت   الاوضه  فوق... وجهزت  كاميرا  كنت  خدتها  من  واحد  صاحبي... وخبيتها  عشان  ما تشكش    فيا... وأحمد  وابويا  كانوا  فوق الاوضه  عشان  يشوفوا  بعينهم  من  الفتحه   اللي  ف  سقف  الاوضة... وحصل  يا  رحمه... قولت  لها  تطلع  لي  وانا  هريحها... وطلعت  لي  ومشيت  الخطه  زي  ما  اتفقنا... وخدتها  ف حضني  وكبس  ابويا  واحمد.... احمد  فضل  يضربها   وجرها  من  شعرها  بقميص النوم  لحد  بيت  ابوها... وخدنا  فيديوهتنا  منها... وطلقها  أحمد   وحلف  ليفضحها  .. بس  ابويا  منعه... ورجعنا  البيت... وحصل  اللي  مكنتش  عامل حسابه... انك  تراقبي  ريحانه   وتشوفيها  ف حضني... رحمه  انا  دورت  عليكي  ف  الشوارع  زي  المجنون... انا  عارف  اني  غلط  ف حقك  كتير   اوي... بس.. بس  يا  رحمه  لسه  الفرصه  ف ايدينا... سامحيني  يا  رحمه... سامحيني  ع  كل اللي  حصل  وارجعي  معايا... خلينا   نربي  أبننا  مع بعض... كفايه  بعاد  يا  رحمه... كفايه  بقا) 


(طب.ليه  ما قولتليش...ليه  ما  صارحتنيش  بالحقيقه  يا  سعد


(كنتي  هتقتليها  يا  رحمه...امي  والجيران  حكوا  لي  انتي  عملتي  فيها  ايه...مكنتيش  هتوافقي  ابدا  ابدا  اني  اخدها  ف حضني...انا  عارفك  كويس  كنتي  هتقتليها  ..كان  لازم  اظلمك  واظلم  نفسي  عشان  اخلص  منها...واللهي  ما  كان  ف  طريقه  تانيه...اقسم لك  بحياتك  وحياه  اللي  ف بطنك  يا  رحمه...)


(طب... انا... انا  خنتك... انا  حامل  ازاى... انا  خاينه  يا  سعد) 

المجد للقصص والحكايات 

(لاء.. لاء  يا  حبيبتي... انتي  أحسن  ست  ف الدنيا  كلها... انا  كنت  هتجنن  لما  قريت  جوابك  وعرفت  انك  حامل... بعد  ما  دورت  عليكي  وحصل   معايا  دروب  كده... تاني يوم  رحت  كشفت... الدكتور   اكد  لي  اني  عمري  ما  كنت  عاقر... روحت  لأم  طليقتي  وهيه  قالت  لي  الحقيقه... بنتها  رشت  دكتور  المعمل  عشان  يطلع  تقرير  بأني  عاقر  وما بخلفش... عملت  كده  عشان  اطلقها  وترتاح  مني... وهيه  كانت  متأكده  ان  غروري  وكرامتي  مش  هيخلوني  ألف  ع الدكاتره  عشان  أخلف... كانت  عارفاني  وعارفه  اني   مش  هذل  نفسي  للدكاتره... المهم  يا حبيبتي... انك  لا  خنتيني   ولا  انا  خنتك  وربنا  شاهد  ع كل كلمه  قلتها لك... ولما  ترجعي  معايا  هتسمعي  الكلام ده  من  امي وابويا   وأحمد) 


رحمه   نظرت  له  بعيناها  الأشبه  بالزجاج  الشفاف   من  كثره  الدموع  المجمعه  ف  مقلتيها... نظرت  للارض


بضياع  وحيره  وعدم  فهم  وتصديق... سعد  مسك  وجهها  وقال  بخوف وتردد


(هتسامحيني.... هترجعي  معايا) 


(سعد.. سعد  انا  كاتبه  ف الأجنده  انك  مش  قادر  تستحملني... يعني  الزهايمر   ده  تاعبك  وقرفك  مني... ايه  اللي  يجبرك  تعيش  معايا... مش ممكن  بعد ما  ارجع  معاك  تزهق  مني  وتطردني  وارجع  ف  الشارع   تاني  لوحدي... انا  مش عايزه  اتبهدل  يا  سعد... مش  عايزه  اتذل  والنبي... انا... انا  حاسه  اني تايهه  وضايعه  طول الوقت... مببقاش  عارفه  نفسي... ببص  لوشى  ف المرايا  ما بعرفنيش... لما... لما  بحلم  بيك... او  اقرأ   عنك  ف الأجنده.. اسال  نفسي... انت  فين... ما جتش  خدتني  ليه... انت  سبتني  ليييه  يا  سعد) 


جذبها  بقوه   لحضنه  وهيه  تشهق  ف البكاء  أكثر... ضمها  بقوه... استنشق  عبيرها  بسعاده... ابعدها  قليلاً 


وقال  مبتسماً 

(يعني  انتي  بيجي  عليكي  وقت  وتفتكريني  يا  رحمه... بتحلمي  بيا) 


هزت  رأسها  إيجابا... اعادها  لحضنه  بقوه  وقال  بسعادة 

(مش  هزهق  منك  ابدا  ابدا  ابدا... الجحيم  اللي  عشته  ف بعدك عني...   هيخليني  اتحمل  نسيانك  وانا  زي الجزمه... وبعدين   ده  كده  احسن... عشان  لما  اضربك  ولا  انكد  عليكي... تنسي  تاني  يوم  وتيجي   ف حضني  عادي.. زي  ما  كنتي  بتعملي  ف الفتره  الاخيرة... يالهوي  يا  رحمه  دا انا  كنت  هتجنن  منك... افتكرتك  ملبوسه  ولا  مجنونه   بجد  واللهي) 


ضحكت  من  كل  قلبها.... مد  يده  مسح  وجهها... وحملها  لحضنه  بقوه... وقبلها   بعنف  وشغف... عله  يطفئ  نيران  قلبه


أخذها  وشكر  الجميع  ع  رعايتها  والاعتناء  بها... أخذها  ليعودا  للأسكندريه... لكنه  تذكر  صديقه

المجد للقصص والحكايات 

اتصل   بمحمود  ليبشره  بهذا  الخبر... محمود   سعد  جداً   واصر  بقوه  ان  يأتي  لمنزله  قبل  ان  يعود  للأسكندريه 

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عادت  فاطمه   من عملها  منهكه... الحمل  ظهر بوضوح  عليها... انتفخت  بطنها   كثيراً  .... والتعب  أيضا يبدو  واضحا  عليها


وضعت  البقاله... ف المطبخ... وجلست  امام  الشاشه... كانت  من  عشاق  المسلسلات  الهنديه  والافلام  الرومانسية 


كانت  تتابع   فيلم  هندي  ... كانت  تنظر  للممثل  شاه روخ خان  وتبكي  تراه  يضم  حبيبته  ويغني  لها


كانت  تزداد  بكاءا... كم  يذكرها  بزوجها  بعيناه  اللامعه  و شعره  الحرير  وقوته  الجباره... ظلت  تذكره  وهوه


يحملها  بيداه  ليتسعرض  عضلاته  الممشوقه... كانت  تضحك  وهيه  تبكي... مسحت  عيناها  وتابعت  الفيلم


لكنها  لم  تعد  تركز... كلما  تذكرت  محمود  لم  تقوي  ع التركيز  ف  شيء   بعدها... نظرت  للباب  من  جديد


كل  ليله  تنظر  له  وتنتظر  عودته... كانت  تحلم  كل  ليله  انه  عاد ف المساء.... عاد  يحتضنها  ويطلب  منها  ان  تسامحه


تحلم  به  انه  يحمل  طفلهم  وهوه  سعيد... ويقبلها  بسعادة  لا  حدود  لها... كان  يبتسم  لها  دائماً   ف الأحلام


لكن  فاطمه  تعرف  جيداً   ان  دوما الأحلام  تعكس الحقيقه... والحقيقه  هيه  انه  لم  يبتسم  لها  ابدا


ولن  يضم  صغيرهم... ولن  يطلب  مغفرتها... ولن  يعود ف المساء.... كانت  تلك  الافكار  تدور  ف  رأسها


عندما  سمعت  طرق ع الباب... انتفضت  مكانها  وقالت  دون  وعي

(محمود... محمود   رجع... محمود  جه... معقول) 


نهضت  تركض... وهيه  تضحك  وسط  الدموع... مسحت وجهها  وفتحت الباب... وكانت  الصدمه


وجدت  منصور التركي  يقف  ع بابها... قطبت  جبينها  وقالت  بحده


(نعم... ف ايه... جاي  لي  هنا  ليييه) 


دفعها  ف  كتفها  ودخل  وخلفه  دخل  رجلان  اخران... دب  الخوف  قلبها... قال  لها  بسخريه


(ما بالراحه  علينا  يا  بطوطه... مالك... انا  جاي  اخدك  يا قلبي) 


انقبض  قلبها  برعب... قالت  بفزع

(تأخدني... يعني  ايه  تأخدني... تأخدني  ع  فين) 


(ما تخافيش  يا  بطه... انا  مش  هعضك.... انا  هأخدك  لناس  مهمه... ناس  دفعت  فيكي  5000 ج... تخيلي   حد  يدفع  فيكي  انتي  المبلغ  ده... ما أكدبش عليكي  هيه  جت  لي  ع الطبطاب.. اصل  كان  نفسي  انتقم  من  جوزك  عشان  خلع... سابني  من  غير  وداع... يرضيكي كده  يا بطوط... انتي  عارفه  لو  كان  إي  راجل تاني   من رجالتي... كان  زمانه  ميت  والدود  بياكل ف جتته... بس  محمود  مش اي حد... رجالتي  سمعته   لما  خطف  الظابط  يوسف  هوه  وسعد جارك  ... كانوا  هيقتلوه  بس  الظابط  قاله  انه  مقتلش  مراته  وانه  راجل  حر... عرفت  بعدها  انه  هرب  زي الجبان  ع  مصر  من  غير ما يقولي... كان نفسي  انتقم  منه  فيكي  بس  عرفت  انك  ولا حاجه  بالنسبه له.. واإلا  مكنش  سابك  هنا  ليا... ف  لقيت  اني  مش  هأذيه  لو  قتلتك  ولا خطفتك... واللي  أكد لي  كده  انه  هيتجوز... خطب  وهيتجوز  اخر الاسبوع  ده... ف انا   قلت  ف عقل بالي  اصبر  لما  تولدي  ابنه  واخده... ولا  اخد  عروسته.... بس  خساره   ف باشا  كبير  اوي  عايزك ف  هضطر  اسلمك  ليه... ومحمود  بقا... مش  هغلب  فيه  هلاقي  له  حد  غالي عليه  ف يوم  وهأخد حقي منه... معلش الصبر اصله  حلو  حلو اوي... هاتوها) 


فوجئت فاطمه... لم يتركوا  لها  فرصه  للصراخ  حتي... ضربها  احدهم  ع رأسها... وكبلوها  ووضعوها  ف جوال


ورفعها  احدهم ع كتفه  وخرج  بها  من العماره... دون  ان يلاحظ  احدا.. او  يشك فيهم....توجهوا  للفان  خاصتهم


لكن  سالم  كان  يقود  دراجه  صديقه  وهوه  لا يجيد القياده صرخ  فيهم  قبل  ان  يركبوا  الفان


(حاسب  حاسب... اوعواااا) 


لكنه  صدم  منصور  بالخطأ... وسقط  هوه  ومنصور  ع بعضهم... رجل منصور  قذف  الجوال  بداخل  الفان  وأسرع


هوه  وزميله  لمساعده  منصور.... دفع  الرجل  سالم  ف صدره  بعد  ان  نهض  وصرخ  فيه


(مش  تفتح  يا  حمار  انت... بتسوقها  ليه  لما  انت  ابن****  مابتعرفش  تسوق) 


سالم  جن  جنونه  من  سب  هذا الأخير  له... قال  بغضب

(انت  بتشتم  مين  ياض  يا****) 


صفعه  منصور  ع وجهه... سالم  فقد  أعصابه... نادي  بأعلي صوته  ع أخواته  الجالسين  ع المقهي  المجاور  الذي  يعمل  فيه  ابيهم


سارع  إليه   أخوته... ولقنوا  منصور ورجاله  درسا  قاسيا... أحدهم   رأي  شعر  فاطمه   يتدلي  من  فتحه  الجوال


صرخ  ف الناس  وسارعوا  اليها... منصور  أستطاع  الهرب... قبل  ان  يقبض  عليه  الجيران  الشجعان


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محمود  ضم  سعد بقوه... كأنه  كان  يحتاج  لشخص عزيز عليه  يكون  بقربه...  سعد  ربت  ع كتفه  وعرفه  ع  زوجته


محمود  سعد  كثيراً   لصديقه... وسأله  عن  أحواله... منع  نفسه   بقوه  ان يسأل عن فاطمه... وجد  نفسه   يطلب  


من  سعد ان  يحضر  زفافه  الأسبوع القادم.... سعد  حزن  ف  قراره  نفسه... لكنه  اؤم  موافقا... وتمني  السعادة 


لصديقه... تبادلوا  الأحاديث  المتنوعه... حتي  رن  هاتف  سعد... رد  ع أخيه


(ايه  يا أمير... انا  لقيت  رحمه  وهاجيبها  وأجي) 


(ماشي  ياخويا... تيجوا  بالسلامه... شفت  يا  سعد... صاحبك  الناقص... عمل  العمله  وهرب  زي الجبان) 


(صاحبي  مين  ف ايه  يا  أمير) 


(صاحبك  محمود  ياعم.... عيال  من  الصيع  اللي  كان  مصاحبهم... خطفوا  بطه  الله اعلم  ليه... بس  احنا  لحقناها) 


وقف  سعد  مصدوم  وصرخ  ف أخيه

(بتقول  ايه... طب  وبطه  كويسه) 


محمود  انتفض  واقفا  وصرخ  فيه

(بطه  بطه  مراتي  مالها  يا  سعد) 


أخذ  الهاتف  من  يده  وسمع  امير  يقول

(لحقناها  الحمدلله....هيه  كويسه  بس  ال**** منصور  التركي  هرب  ... ورجالته  حصلوه  ف الزحمه... اصلنا  خدناها  ع الصيدليه   ليكون  حصلها  حاجه  هيه  ولا  اللي  ف بطنها) 


محمود  نظر  بفزع  لسعد... سقط  الهاتف  من  يده... قال  بصدمه  لسعد


(اللي  ف بطنها..... قصده  ايه  باللي  ف بطنها) 


(ليه  هوه  انت  ما تعرفش  انها  حامل... هيه  ما قالتلكش) 


(لاء... لاء  ما قالتش  يا  سعد) 


(اووه... انا  اسف  يا صاحبي.... طب  عاما  حصل خير... انا  مضطر  أستاذن  بقا  عشان  نلحق  الموصلات) 


محمود  كأنه  تلقي  صفعه  مدويه  ع وجهه... لم  يسمع  سعد  ولم  يدري  بالعالم  حوله... سعد  نظر  لزوجته


وعاد  يربت  ع  كتف  محمود... نظر  له  محمود... و الحزن  يكسو  وجهه... قال  كأنه  يتحدث  من  بعيد... قال  بصوت  مخنوق 


(ما قالتليش  يا  سعد... عشان  كده  كانت  رافضه  تأكل  من  الحرام... مكنتش  عايزه  ابني  يكبر  من  الحرام  ف بطنها... طب  ليه  خبت  عليا... انا  ليه  بيحصل لي  كده... بطه  دلوقتي   عمرها  ما هتسامحني   حتي  لو  عملت  ايه... هتفتكر  اني  راجع  لها  عشانه... عشان  ابني... اعمل  ايه  يا  سعد... قولي   اتصرف  ازاي  انا  دلوقتي) 


سعد  نظر  له  بحيره  وضياع... لكن  قالت  رحمه  فجأة 

(يعني ايه  هتعمل  إيه.... انت  مش  رميتها  ورا  ضهرك  وعشت  حياتك... انا  اللي  اعرفه  ان  الراجل  لو مش بيحب  مراته  مش  هيفرق   معاه  اذ  كانت  شايله  ابنه  ولا  لاء... هيسبها  بلي  ف بطنها.... وانت  يا محمود  هتتجوز  وهتخلف  عيال  غير  العيل  ده... ف ممكن  افهم  العيل  ده  فارق  معاك  ف ايه) 


سعد  بعتاب  وحده  لرحمه

(ايه  العبط  اللي  بتقوليه  ده) 


رحمه  بغضب

(بقول اللي  سمعته... يعني  هوه  سابها  و راح  شاف غيرها  و هيتجوزها... عايز  ايه  بقا  منها... انت  سبتها  لوحدها  ودي  النتيجة... كانت هتتخطف  والله  أعلم  كانوا  خاطفينها  ليه.... انت  بتضحك  ع نفسك  ولا  علينا.... لو  هيه  مش فارقه  معاك... يبقا  ابنها  فارق معاك  ف ايه... وبلاش  والنبي  تقولي  دا  ابني... بلاش   الكلمه  دي) 


سعد  نظر  لها  بعتاب  شديد... محمود  جلس  يآسا  ع  الأريكه  ووضع  يده  ع  رأسه  ... رحمه  ندمت  ع كلامها


هيه  لا تعرفه  ولا تعرف  او لا تتذكر  زوجته... لكنها  حكمت  عليه  مما  سمعته  منهم  هما الاثنان... نظرت


لزوجها  بندم... اقتربت  من  محمود  وركعت  لمستواه  مسكت  يده  بأخوه  وقالت  بصدق


(محدش  فينا  ملاك  يا محمود... محدش  ما بيغلطش... بس  عين  الغلط  انك  تعاند  وتستمر  فيه... الست مننا  قلبها  كبير  اوي... وبتتمني  تسامح  جوزها... بس  هوه  يطلب  السماح... محمود  انت  مشيت  من  هناك  ع كلامكوا  دلوقتى   وسايب  اعداء  ياما.... كان  لازم  تعرف  ان  اعداءك  مش  هيسبوك  ف حالك... وهيأذوك  ف اعز  ما ليك... محمود  اعمل  الصح... أرجع  معانا  اسكندرية... وصلح  اللي  كسرته... خلص  مشاكلك  مع  الناس.... وأرجع  لمراتك... اطلب  منها  فرصه  تانيه... قلها  انك  اشتقت لها... ما تجيبش  سيره  الطفل... قلها  انك  ندمان  انك  هجرتها.. قول  اللي  ف قلبك  يا محمود... وهيه  أكيد  هتصدقك  انا  معرفهاش  ومش  فاكرها... بس  انا متأكده  انها  حزينه  وبتتعذب  عشان  هجرتها... تعالي  يا محمود... ارجع  معانا  ... ارجع  لها... اكيد  هيه  مستنياك  ترجع  ف اي لحظه) 


نظر  لها  محمود... ونظر  لسعد... اؤم  سعد  له... محمود  وقف  أمامه  وقال  بجديه


(مراتك  عندها  حق.. انا  راجع  معاكوا... هرجع  وهنتقم  من  الكلب  ده  بس  مش  هوسخ  ايدي  انا  هروح  ليوسف... وهقوله  ع  كل حاجه   عن  العالم **** دول) 


(يوسف... يوسف  مين  يا  عم  محمود... ما خلاص  راحت  عليه... لبسوه  كام  قضيه  عنب  ومش  هيشوف  الشارع   تاني) 


(بجد  وربنا) 


(اه  واللهي.... يا عم  سيبك  منه.. ف  ناس تانية   تقدر  تساعدنا  هأخدك  ونروح  لهم.... بس  الأول  ترجع  تطمن  ع مراتك) 


(لاء،، يا سعد  انا  مش  هبص  ف وشها  غير  اما  اجيب  لها  حقها  من اللي  عملوه  فيها... غير  كده  مش  هعرف  أبص  ف  وشها) 


(خلاص  يبقا  ترجع  معايا  وتقعد  ف بيتي  أعرفك  ع  اهلي  وبالمره  أبقي متطمن عليك.. لاحسن  بعد اللي عملوه  ف  بطه  ده  ما أضمنش  ممكن  يعملوا فيك  ايه  لما  ترجع  ممكن  يغفلوك  يا  صاحبي... اسمع  كلامي  ومش  هتندم... خليني  اساعدك  يا  محمود... عشان  تخلص  وتخلصنا  من  العالم  ال*** ديه) 


اؤم  له  موافقا.... ابتسم  له  مؤيدا... وانطلقا  معا  ف طريق  العوده... محمود  كان  ينظر  لسعد  وزوجته


كان  يشعر  بقلبه  يشق  صدره... هذا  هوه  الحب  ... وهما مثال حي  للأحبا.. سعد  يضع  ذراعيه  حول  زوجته 


طوال الوقت  كأنه  يخشي  ان  تهرب  منه... محمود  تعجب  منه  كثيراً... هل  حقاً   سيعيش  مع  امرأه   يمكن  ان تنساه  ف اي لحظه؟؟؟؟ 


لكنه  يري  الإجابه  بوضوح  ف نظرات  سعدت  وقبضته  المتملكه  ع  كتفها... والسعادة  الغامره  التي  تملؤ صوته  


وكلامه.. خاصا  عندما  ينظر  لبطن  زوجته  كأنه  ينظر  لطفله  عبر  بطنها... شعر  محمود  الان  فقط  بما فقده


هوه  احب  الحياه  مع  فاطمه.. احب  جدالها  ومشاجرتهم  معا... احب  الطهو  لها  والسير  معها  والحديث  المختلف  والجدال  حول  كل شىء 


لما  تركها  ولما  نظر  لأمرأه  غيرها  ولما  لم  يفكر  بالعوده  لها  ...... خوفا  كبير  يتربص  بقلبه  كلما  اقتربا  من  الوصول الوشيك


      يتبع ف الفصل  23و24

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