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رواية موعد في المساء الفصل الخامس عشر والسادس عشر

 

المجد للقصص والحكايات


#فريده_احمد_فريد



رواية موعد في المساء 




وعاد ف المساء 




الفصل الخامس عشر و السادس عشر




المجد للقصص والحكايات 




دماؤه تجمدت  حوله... يفتح عيناه بمعجزه... يرفض الاستسلام  للموت... بهذا الشكل البشع.. قال وهوه  يجاهد


ليخرج  صوته  من بين  شفتيه اللتان  تصطكان  ببعضهما  من البرد


(يارب... عمري  ما دعيت  لنفسي  بحاجه... عمري  ما حاولت  اقرب منك  او  استعين بيك  يا جبار... يمكن  انا  ظلمت ناس... يمكن  افتريت  ع ناس... يمكن  دعوا  عليا  ليل ونهار... بس.. بس  انا  مش  هقدر  اطلب منهم  يسامحوني دلوقتي... بس  انت يارب... يا عظيم  يا ساكن القلوب  و العيون... يارب  يلي  بتسمع  الضعيف  والمحتاج... يارب  انا مش هقولك  انجدني... لو  دا  وقتي.. لو  دا  معادي  اني  أجي لك... خدني.. يارب  انا  تعبت... مبقتش  قادر  احس  بجسمي... يارب  ارحمني  وخدني  انا  مش قادر  اتحمل  اكتر  من كده... يارب... يارب..انت  اللي  قلتلها  ف كتابك..بسم الله الرحمن الرحيم

لا يكلف الله نفسا الاوسعها  لها  ما كسبت  وعليها ما اكتسبت...ربنا لا تؤاخذنا اذ  نسينا او أخطاءنا...ربنا  ولا تحمل علينا أصر كما حملته  ع اللذين من قبلنا...ربنا  ولا تحملنا  ما لا طاقه لنا  به...واعفو عنا  واغفر لنا  وأرحمنا  انت مولانا  ف انصرنا  ع القوم الكافرين.....صدق الله العظيم...صدق الله العظيم   يارب...يارب...يارب  والنبي  ارحمني) 


لم تعد  هناك  دموع  ليذرفها... جفت دموعه  كما شارفت  دماؤه  ع  الجفاف... الحياه  تنسحب  منه  بالبطئ


يتنفس  اتربه  خانقه... شل  جسده  ع هذا  الوضع  القاسي... ظل  يدعي  كي  يأخذ الله  امانته


(لا إله إلا  انت سبحانك إني كنت من الظالمين) 


ظل يرددها  عشرات  المرات  حتي  عجز لسانه  عن  النطق.. اغمض  عيناه.. داعيا الله  ان لا يفتحهم  مجدداً 


لكن... الله  السميع العليم.. الرحيم... الذي  لا تأخذه سنه ولا نوم... لا يغفل  عن  ذكر عباده... لا يتجاهل  توسلاتهم  

ويجعل  لهم مخرجا  من  اضيق  الظروف.. سبحان الله 


يوسف  كان  ف  ظلمه حالكه... لكن  عندما  ينظر  للأعلي  يري  بصيص  ضوء  باهت  مصدره  القمر  وبعض  اعمده  الاضاءه  البعيده


كان  مغمض العين... محطم  القلب  والجسد... وفجأة... أظلم  المكان... اكثر  من  ظلمته... يوسف  نبضات  قلبه


عادت  للحياه  من جديد.. تسارعت  نبضاته... فتح عيناه  رآي  ظل عالي  ينظر  له... وسمع  صوتها  كنداء ملائكي  من السماء


نظر  لأعلي  وبالفعل  وجد  أحدهم   ينادي  بصوت  خائف

(توسف... تووووووسف... انت  هنا... لد عليا(رد عليا).... تووووووسييييييف) 


ابتسم... ضحك... حمد الله... قال  وهوه يجاهد  ليخرج صوته


(أي... أيمان... انا  هنا... أيمان  انا  تحت  هنا) 


ايمان  بفرح(توسف  انت  هنا  حمد لله  يارب... انت  فين  انا  بدول  عليك(بدور عليك).... انت بتعمل ايه  عندك) 


(ايمان... أيمان   ساعديني  انا  هموت... حد  جه  معاكي) 


(لاء، يا  توسف... انا  من  امبارح  باجي لك  من  البيت) 


(ايييييه  يعني  ايه) 


(يا توسف  صحابك   كل سويه(شويه)... يجوا  يسألوا عنك... انا  فكلت(فكرت)... وقلت  انك  لسه  حنا... جيت لك  مسي(مشي)... من البيت... وانا  تعبانه  وجعانه  اوي.. انت  ما لجعتس (مارجعتش) البيت ليه...) 


(ايمان... انتي  عملتي  كده  عشاني... طب  معاكي  تلفون.. لاء  تلفون  ايه  انتي معكيش  صح) 


هزت رأسها  لكنه  لم  يرها  هوه  فقط  يري  ظلها  ويسمع  صوتها... قال  بيآس


(أيمان  حاولي  تساعديني... لو  فضلت  هنا  ساعه  كمان  هموت... ايمان  انا  مش عايز اموت  الموته  دي  لو  مش  هتعرفي  تساعديني  ااقتليني  احسن... بس  ماتسبينيش كده يا  أيمان) 


(موش  حسيبك  ابدا  ابدا.. انا  ححاول  اطلعك  اصبل(اصبر)...) 


بحثت  ايمان  حولها  بأستماته... وجدت  حبل  ضخم  من  معدات  البناء.... ربطت  الحبل  ف  عمود  مسلح  وأخذت  الطرف الاخر 


وعادت  ليوسف  وقذفت  اليه  الحبل  دون  ان تنبه... سقط  عليه  فصرخ  متألما... قالت  له  بأعتذار


(اسفه  يا توسف... معلس... اطلع  بقا) 


(أطلع.. طب  إزاي  يا ايمان  انا  رجلي  مكسوره) 


(يا لهوي) 


ايمان  كانت حائره.. أتتها  فكره  لم تتردد.. مسكت  طرف  الحبل.. وبدأت  تهبط  اليه  سألها  بأنفعال


(انتي  بتعملي  ايه.. راحه  فين  يا ايمان) 


(ما تخافس(ماتخافش)... حنقذك  يا توسف) 


لم  تعد لديه  القوه  ع  الجدال  او  الكلام... هبطت اليه.. دعست  قدمه  بقدمها... صرخ... أعتذرت  منه... ووضعت  قدمها  بين  قدمه... قالت  له


(بص  انا  حلف  الحبل  حوالين  وسطي  وحشيلك  ع ضهري  واطلع  بيك) 


(نعممم... انتي  بتخرفي  يا  ايمان... مستحيل   ده  يحصل  انا  وانتي  هنقع    ومش هتتحمليني) 


(مالكس (مالكش)... دعوه  انت... امسك  فيا  جامد اوي  اوي  ماسي(ماشي)...) 


لم يجد  مفر  منها... انحنت  ليضع  يداه  حول عنقها... كانت  مهمه  مستحيله   لا  صعبه... لكن  الإنسان   عندما  يجد  حياه  من  يحبه  ع المحك


يندفع  الادرنالين  ف  المخ  والشرايين... ويصبح  الفأر اسدا جاسورا... وهذا  ما  حدث  مع  تلك  الفتاه


حملت  جسده  الثقيل... لكنه  وجد  انها  لن  تستطع  الصعود  كل  تلك  المسافه... قال  لها


(ايمان  ايمان  اصبري... انا  عندي  حل.. هوه  صعب  برضو  بس  ارحم  من  ده  كده  ضهرك  هيتكسر  وايدك  مش  هتتحمل  وهنقع  سوا... بصي  انتي  نزليني  تاني  ولفي  الحبل  عليا.. وانا  هحاول  اطلع.. وانتي  ع  اد ما تقدري  حاولي  ترفعيني  لفوق  فهمتي) 


(اه  فحمت(فهمت)... انا  هطلع  ع الحبل  وأشدك  من  فوق) 


(ايوا  برافو عليكي... يلا  نزلينا  واعملي  اللي  هقولك  عليه  بالحرف) 


أنزلته  و ربطت  الحبل  حوله.. وتسلقت  هيه  لأعلي.. طلب  منها  ان  ترفع  الحبل  بقوه... وسيساعدها  هوه  بالتسلق  بيده


ايمان  فعلت  هذا.. كانت  تصرخ  وهيه  ترفع  الحبل  بقوه.. و هوه  ايضا  حاول  رفع  جسده  والتسلق  ع الحبل


لكنه  كان  يصرخ  كلما  اهتزت  قدمه  المكسوره... وايضا  ضلوعه  تؤلمه  بقسوه.... ظلا  لعده  دقائق   ف  هذه  المعضله


لكن  اخيراا   صعد  يوسف.. تركت  الحبل  ومسكته  من  ذراعاه... ورفعته  وهوه  دفع  جسده  معها


سقطا  معا  ع  الأرض.. سقط  هوه  تحديداً   ع  قدمها  صرخت  لكنها  ضحكت  و ضمت  رأسه  التي  تقبع  ع قدمها


ساعدته  ف  الجلوس... مسك  قدمه  المكسوره وقال   بأبتسامه  لم تراها  ع وجهه  من  قبل


(شكراً   يا  أيمان... انا  مديون لك  بحياتي) 


كانت  تهم  بالرد  عليه  بمزاح... لكن فجأة   سقطت  رأسه  بقوه ع الأرض   ... فقد  يوسف  وعيه 


صرخت  بفزع

(يوسيييييييييييييييييييييف) 


ظلت  تقلب  رأسه... نهضت  مسرعه وركضت  للطريق  وقفت  ع  الطريق   ف منتصفه... نظرت  للخلف وللامام  ف انتظار عبور  سياره


ظهرت  أخيراً   سياره  نقل... وقف السائق  فجأة   عند رؤيته  لها... هبط  من سيارته... وسارع  معها  لمساعده  يوسف


وصلا  المشفي  القريب  واجريت  عمليه فوريه  له... قالت  اسمه  للطبيب  واتصل  الطبيب  بالقسم  وابلغهم


آتي  انس  وقاسم  يركضون  كالمجانين... وجدا  ايمان  تجلس  ع الأرض... تعض  ف كم  ثيابها  وتبكي  بصمت


رفعها  قاسم  تقف  ع قدمها  وسألها  بهلع

(يوسف  فين  يا ايمان... يوسف  عايش  اتكلمي) 


زادت  ف البكاء... خرج  الطبيب  .. لكز  قاسم  انس  وركضا  للطبيب... طمئنهم  ع حاله... وتركهم


ظلا  معه  الثلاثه  وقصت  لهم  ما  حدث  صرخ  فيها  انس

(وانتي  ازاي  ما قولتيش  قبل  كده  عن  المكان  ده  احنا  كنا  كل  ساعه  عندك  ليه  ما قولتيش  يا  متخلفاااااا) 


قاسم(اهدي  يا  أنس  الحمد لله   انها  لحقته  ف الأخر) 


انس  بغضب(وهيه  ما قالتش  ع المخزن  ده  ليه  من الأول) 


بكت  بصوت  عالي... اقترب  منها  قاسم.. رغما  عنها  ارتمت  ف  حضنه... اجهشت  ف بكاء  حار  خانق.. لكنها  قالت  من  بين  دموعها  وشهقاتها


(انا  مكنتش  اعرف  انه راح هناك  واللهي.. هوه ماقالش... انا  بس...انا  عرفت  من بابا  عبد الخالق...هوه  ظهر لي ف الاوضه  تاني  وقالي  ألحقي  ابني  يا إيمان.. واللهي  انا مكنتش  اعرف  ان  دا... حقيقه) 


بكت  بكل  وجع... ضمها  قاسم  ليهدئها... أنس  جلس  ع الكرسي  ونظر  ليوسف الممدد  امامه  لا حول له ولا قوه

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ف منزل سعد 

عاد منهك  من  الورشه... دخل  غرفته  ليبدل  ثيابه  ويغتسل  كالعادة.... فوجئ  بصوت  ف حمام  غرفته


فهم  انها  رحمه  بدل  ثيابه  بسرعه  وقرر ان يغتسل  ف حمام  آخر.. لا يريد  ان يلتحم  معها  لانه  يعلم  انها  لن  تكلمه  او  تنظر  له حتي


بدل ثيابه  و هم  بالخروج... سمع باب الحمام  يفتح... خرجت  رحمه  وهيه  تلف  المنشفه  ع جسدها.. نظر  لها  سعد


أبتسمت  له  وركضت  اليه  . قالت  وهيه  تضمه  وتضع  رأسها  ع  صدره


(حبيبي  انت  رجعت... أتأخرت  ليه  كده) 


ابتعدت  عنه  قليلا  وجدته  يرتدي  ثياب  البيت  النظيفه  قطبت جبينها  وقالت  له  بحده  مصطنعه


(ايه  ده  بقا  ان شاءالله... حضرتك   لبست  الترنج  قبل ما  تتشطف  ليه... هوه  انا ناقصه   يا  سعد   تشحم  الترنج الأبيض... وتبوظه... اه  ما عشان  الغساله  بتاعتك  تغسل  وراك  صح... سعد  مالك  ف ايه... بتبص  لي  كده ليه) 


كان  ينظر  لها  بصدمه... هزته  وقالت 

(مالك  يا  سعد  ما  ترد  عليا) 


هز  رأسه  كأنه  يستوعب  ان  هذا  يحدث  حقا... قال  لها 

(رحمه  انتي كويسة... انتي  مالك.. ف ايه.. مش انتي كنتي... كنتي  زعلانه  مني وما بتكلمنيش) 


(زعلانه  منك... ليه... ف ايه  يا  سعد  انت  عايز  تتخانق  معايا  وخلاص  ... هوه  انا  عملت  لك  حاجه  طب) 


سعد  لم  يفهم  شيئاً... نظرت  له  وابتسمت... رفعت  نفسها   لمستواه  وقبلت  شفتاه  ببطء... وقالت  برغبه


(وحشتني) 


سعد  وجد نفسه  حائرا... لكن  نار  الرغبه  تملكته.... مسك  المنشفه  ونزعها  عنها  وأحتضن  جسدها  العاري.. لكنها  قالت  له  بذعر


(الباب.. روح  اقفل  الباب... بدل  البومه  ما  تدخل  علينا  فجأة) 


ضحك  وتركها  مجبر... وذهب  للباب  أغلقه  وعاد  لها   كانت  خجله  منه  رفعت  المنشفه  عليها  مجدداً 


نظر  لها  بعتاب  مصطنع... و نزع  المنشفه  بقوه... وحملها  وقذفها  ع  الفراش... وانقض  عليها  كعادته  وكما  تحب  هيه  ان  يفعل  هذا  بها

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نظر  محمود  حيث  تنظر  ورآي  خمس  شباب  يقفون  وينظرون  له بتهكم...محمود  نظر  لفاطمه  وعيناه  مفتوحه ع اخرها  وقال


(الكلام  ده  كان  ليا  انا)


نظرت له  بعيون  دامعه.... وهزت  رأسها  بخوف  شاره  نعم  لك  انت


محمود  اشتعل  غضبا...تركها  وسار   إليهم..نظروا  له  بتهكم  لمعرفتهم  السابقه  بضعفه  وجبنه


وقف  امامهم  بشموخ...وقال

(الكلام اللي  قولته ده  كان  ليا  انا)


رد  شاب  اخر  بتهكم

(اومال  لأمي..ايوا  ليك  انت  يا م*****)


لم  يكمل  الشاب  كلمته...تلقي  لكمه  ف وجهه  كسرت  له  أنفه..نظر  الرجال  لمحمود  وتجمعوا  عليه  ليصرعوه


لكنه  بمنتعي السهوله...صرعهم  جميعاً...لم  يبذل  مجهود  يذكر  ف  ابراحهم  ضربا...فاطمه  كانت  تكتم  صراخها  بفزع


لم  تصدق عيناها  ان  هذا  هوه  نفسه  محمود  زوجها... الرجل  الجبان  المسالم... محمود  بصق  عليهم  وظل  يسبهم  بأسوء  الألفاظ 


فاطمه  ركضت  إليه  ومسكت  يده  بخوف  وقالت

(تعالي..  يلا  كفايه  كده  يا  محمود) 


نظر  لها  ودفع  يدها  بعيداً   وسار  للمنزل... دخلا  المنزل  واغلقت  الباب  وهيه  لاتزال  ترتجف


لكنها  سعيده  لأنه أخذ  حقه  منهم... وانتقم  لنفسه... قالت  له


(مش عارفه  اقولك  ايه... بس  ايه  ده  يا محمود  انا  مش  مصدقه  انك  ضربت  كل  دول  لوحدك) 


(مش مصدقه   ليه.. تحبي  اضربك  زيهم  عشان  تصدقي) 


(لالالالالالالا... انا  مصدقاك... خلاص  خلاص.. طب  ادخل  غير هدومك  عقبال  ما  اعمل  العشا...يلاااا)


نظر  لها  ببرود  لأعطاءه الأوامر  وتركها  ودخل  الغرفه...كانت  تعد  العشاء  وهيه  سعيده  ...تدندن  بمرح


دخل إليها  المطبخ..نظرت  له  بتساؤل   قال  لها

(العيال  دول  عملوا  كده  ليه)


(عشان  ..عشان  يا محمود)


(انطقي  عشان  ايه)


(هما  ضربوك  قبل  كده  اتكاتروا  عليك  وضربوك  من غير ما تعمل  لهم حاجه)


(لا  واللهي  مرازيه  يعني)


(اه  هما  كده  بيرازو  خلق  الله  كلهم  من غير ما حد يدوس  لهم  ع طرف)


(ماشي  وانا  بقا  هشتغل  لهم  ف الأزرق)


(لاء  يا محمود  والنبي  بلاش  متنساش  انت  هربان  من ايه  ما تفتحش  علينا  طاقه  جهنم  وبعدين  المشكله  مش  ف شويه  الصيع  دول  المشكلة  ف  كبيرهم

منصور  التركي... هوه  مشهور  هنا  بمنص... دا  خطير   و اي حد بيعمل له ألف حساب وحساب... بيتقال  انه  شغال  مع ناس  خطيره  اوي... بس  محدش  يعرف  يثبت عليه اي حاجه... ف  يا محمود  عشان خاطر ربنا   ابعد  عن  الشر  وغني  له  ماشي) 


(وانا  ما بخافش  يا  بطه....بس. انا  هعيش  ف حالي    وهبعد  عن  الشر  وأبقي  غني  له  انتي) 


تركها  وخرج... ضحكت  بصوت عالي.... انهت  اعداد العشاء... وتناولا  معا... وسهرا  قليلا... فاطمه  كانت


ترتدي  قميص  حريري  قصير... كانت  تجلس  تتابع  احد المسلسلات  ولم  تنتبه  ان  محمود  ينظر  لها


قال  فجأة 

(سبحان مغير الاحوال.... بقيتي  تقعدي  براحتك   ادامي  اهوه  يا حلوه... مش قلت  لك  هنسيكي  يعني ايه  كسوف... بقيتي  بجحه  اهوه) 


وقفت  مذعوره  وقالت  بجديه

(تقصد ايه  يا محمود... هيه  قعدتي  كده  غلط... فيها حاجه  يعني  ادخل  ألبس  حاجه  تانيه) 


ابتسم  بسخريه... غضبت  منه.. عضت  ع شفتيها  بغيظ.. ودخلت  لترتدي  شيئاً   اكثر  حشمه... لكنه  مسك  يدها  قبل  ان  تصل  الغرفه


جذبها  بقوه  جلست  ع قدمه... نظر  لعيناها  وقال  بهمس

(انتي  مجنونه... مروشه... ايه  اللي  غلط  وتغيري.. مالك  يا بت... ليه محسساني  دايما اني  متجوز  خضرا  الشريفه... ايه  مش عارفه  الست  المتجوزه  بتعيش  ازاي  مع جوزها) 


(انت عايز  ايه) 


(هعوز منك  انتي  إيه... مش عايز  حاجه... انا  بس  بحب  اغيظك.. وبعدين   ايام  ما كنتي بتتكسفي  مني.. كنتي  بتجننيني عليكي... دلوقتى   بقا  عادي   مفيش  أثاره... ليه  كده.. ما  ترجعي  تتكسفي تاني... عشان  الصراحه   انا  بحب  الشراسه... فكره  اما  كنتي  بتهربي  مني  وتجري  ع  السرير... واجري  اجيبك  تحت  رجلي... كنت  بتبسط  اوي.. ما... ما تقومي  كده  اعملي  اي حاجه... خليني  اتجنن  عليكي) 


هيه   لم تكن  تسمع  نصف  كلامه  نيران  العشق  ألهبتها  ... كانت  تنظر  لشفتاه  بلهفه.... أرادت  ان  يلتهم  شفتاها  كما  يفعل


لكنه  لا  يريدها  سهله... يحب  التحدي  والآثاره... لكنها  لم  تقوي  ع  الابتعاد  عنه... شعرت  انها  اذا  لم  يلمسها   حالا... ستفعل  هيه


محمود يستمتع  كثيراً   لأثارتها  وتركها  هكذا... لكنها  لم تعد تحتمل   و هجمت  عليه  بقبلاتها  العاشقه... كان  يضحك من كل  قلبه


وهيه  ترجوه  وهوه  يعاند... لكنه  لم  يستطع  مقاومتها  أكثر... حملها  بشوق  الي  غرفتهم.... وبادلها  الغرام  بعنف  كي  يرضي  نفسه

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ف غرفه المشفي


فتح  يوسف  عيناه  أخيراً... شعر  بثقل  ع  صدره... نظر  وجدها  ايمان  تنام  بجواره  وتضع  رأسها  ع  صدره


أبتسم  وضم  رأسها  أكثر... ظلا  هكذا  لفتره... فتح الباب  ودخل  انس وقاسم... ركضا  اليه  .. قال  لهم


(أهدوا  انا  كويس... وطوا  صوتكم  سبوها  نايمه) 


قاسم  بقلق(ايه يا يوسف  حرام عليك... موتنا  من الخوف   يا  شيخ) 


انس اقترب  منه ووضع  يده  ع  جبهته  وقال

(الحمد لله  الحراره  نزلت.. تلاقي  ايمان  طول الليل كانت سهرانه  جمبك... معلش  بس  هيه  الغلطانه.. كان  لازم  تقول لنا  ع المخزن  ده... وانت... انت  اتجننت  من  أمته  حد  فينا  بيروح  مكان  لوحده... يوسف  انت  لقدر الله   لو  كان  جرا لك  حاجه  مكنتش  هعرف  اسامح  نفسي  لا  انا  ولا  قاسم... يابني  احنا  مش  شركا  ف الشغل  بس   احنا  اخواتك  يا  يوسف  ف  ايه... ليه  عملت  كده) 


يوسف بتعب(خلاص  يا رجاله... قدر الله وماشاء فعل.. عدت ع خير) 


انس  بضحك(يا سلام  ما شاء الله   يوسف  دخل الإسلام  يا رجاله) 


ضحكا  معا... تحركت  ايمان  واستيقظت... نظر  لها  يوسف   وقال


(صحيناكي  معلش... انس  بقا  ... بكره  تعاشريه  وتعرفيه... واد  مشكله) 


ايمان  بتعب  وارهاق

(توسف  انت  كويس... لسه  سخن  يا توسف) 


يوسف  بجديه(لاء  انا  كويس الحمد لله... انتي  شكلك  تعبانه  اوي... قاسم  لو سمحت   قول  للدكتور  يكتب لي  ع خروج... ايمان  لازم  تروح  ماينفعش  تفضل  هنا  ف المستشفى   ولا  ينفع  تفضل  لوحدها  ف البيت) 


قاسم  وانس  نظرا  ليوسف  نظره  ذات  مغزي... لكنه فهم  نظرتهم... قال  بحده  وقد  عاد  لوضعه  السابق  من جديد


(ما تخلصوا  هتفضلوا  متنحين لي  كده  يلااا  نادوه  ) 


انس  بضحك(صحيح   ديل  الكلب  عمره ما هيتعدل.. اللي  فيه  داء.. ياباي  عليك  جدع... حاضر.. خلاص... يا دكتور.. انت  ياض  يا دوك... كده  حلو  يا  عم... اهو  هينادوا لي  الامن  يرميني  بره  ارتحت  كده) 


قاسم  بضحك(و ف اقرب  صندوق  زباله) 


ضحكت ايمان  بصوت عالي.. ضحك  يوسف  بتعب.... جاء الطبيب... و وافق  ع خروجه  بشرط  الراحه  التامه


عادا  لمنزل  يوسف... اعد  انس  بعض  الطعام  للجميع... و تناولا  الغداء  معا... وتحدثا  عن  العمل


حان  وقت  مغادره  الشباب.. تركوا  يوسف  ف غرفته... ورحلا  ع امل  العوده  ف الغد


ايمان  قالت  له  بضحك

(انا  بقا  حعمل لك  اكل... خلاص واللهي  انا  اتعلمت  ماسي) 


(ماسي  ياختي... بس  الكلام ده   بكره ان شاءالله... انا  دلوقتي   عايزه  انا.. انا جعان  نوم) 


(توسف... ممكن  يعني.. لو  ينفع... انام  معاك  النهارده   ع  السرير) 


ابتسم   ومد  يده  لها... مسكت  يده  بسعاده  وقفزت  للفراش... لكنه  صدمته  دون  قصد  صرخ  وقال


(ااااه  يا بنت  الجزمه  .. من  اولها  كده  هتهبلي... نامي  عدل  بدل  ما ارميكي  من  هنا  سامعه) 


(خلاص  معلش) 


وضعت  رأسها  ع  صدره... يوسف  دثرها  بالغطاء  جيداً.. وأحتضن  رأسها... حاول  ان  ينام... لكن  قربها  منه  بهذا الشكل 


يثير  فيه  غرائز  لم  يظن  يوماً   انه  يملكها... تحسس  بأنمله  جسدها  تحت  الغطاء.... لكنه  تذكر  الشده  القاسيه


التي  مر  بها... نفض  ما  كان  يحاول  فعله... استغفر  ربه... و رفض  ان يخضع  للشيطان  ويظلم  تلك  الفتاه  البريئه


نام  بعد  جهد جهيد.... لكنه  فكر  جديا... ان  يصحح الاوضاع   ويجعل  هذا الزواج  المزيف  حقيقي


قرر ان  يطلب  من  قاسم  ان  يبحث  له  ف ماضي  ايمان  ويحقق  مع  الأفراد  اللذين  قبضوا  عليهم  من عصابه  


اشجان  ليتوصل  لعائله  ايمان  او حتي  يعرف  اسمها  الحقيقي  ... ليستطيع  ان  يتزوجها  رسميا


     المجد للقصص والحكايات 

#فريده_احمد_فريد


وعاد ف المساء 

الفصل السادس عشر......... 


ف غرفه سعد

أستيقظت  رحمه  باكرا  كعادتها... فتحت عيناها  بكسل... لكنها  تسمرت فجأة   عندما  رأت  السقف  


نظرت حولها  بهلع... وجدت  الغطاء  يسقط  من عليها... و رآت  الصدمه... وجدت  نفسها  عاريه... رآت بطرف عيناها


سعد ينام  بجوارها   عاري  هوه  أيضاً... رحمه   بأعلي  صوتها  صرخت  صرخات  عاليه... وقفت  و لفت  الغطاء  حولها  وهيه  تصرخ


سعد  نهض  مفزوعا.... نظر  حوله  ليستوعب  ما الأمر... نظر  لها  وصرخ


(ف ايييييييه... البيت  بيولع  بتصرخي كده  لييييه) 


باب  غرفتهم  دق  بعنف... سعد  نظر لها  وارتدي  بنطاله سريعاً   وركض  يفتح  لأسرته... دخلوا جميعاً 


ووقفوا  مصدومين  يتسألوا  ماذا حدث؟؟ نظروا  جميعاً   لرحمه  التي  تغطي جسدها  العاري  بالغطاء


نظرت  لهم  برعب  وصرخت  فيهم..ف سعد تحديداً

(انت   بتعمل ايه هناا... انا اللي بعمل ايه  ف بيتكم.. انت عملت  فيا  ايييييه.. حرام عليك  دا احنا  جيران... عملت  فيا  ايييييه) 


صمت  وذهول  علي  وجوه  الجميع.. نظروا  لها  بصدمه  واستغراب... سعد  فاق  أخيراً   من  صدمته  وصرخ فيها


(انتي اتجننتي... انتي  بتقولي  اييييه) 


رحمه  بصراخ

(بقول ايه... يعني ايه  بقول  ايه... انت  عملت  فيا ايه... نايم  جمبي  عريان  ليييييه) 


الام  اقتربت  منها  وقالت بذهول

(مالك  يا رحمه... ف إيه.. انتي  نسيتي انك  متجوزه  سعد  إبني) 


رحمه  بصدمه(انا ايييييه.. إزاي.. وأمتي... وانا  اتجوز  سعد... مستحيل   اني  اتجوزه... مستحيل... ازاي  وافقت  اني  اتجوزه) 


رد  سعد  بغضب

(مستحيل  تتجوزيني... ليه  يا*****هوه  انا  مش  من مقام  ****... انتي  اتهبلتي  ولا  بتستعبطي  ولا  حكايتك  ايه  انتي) 


رحمه   نظرت  له  بخوف  نظرت  لهم  جميعاً   برعب... كأنهم  سيلتهمونها  او ما شابه... قال  آدم   لأخيه


(ما توديها  لدكتور  مخ واعصاب   يا  سعد... رحمه  شكلها  عندها  حاجه... هيه  صحيح   بتنسي  كتير  اوي) 


ريحانه   بتهكم  وسخريه

(ايه  يعني  قصدك  تقول  عندها  زهايمر) 


الام  بحزن(آدم   عنده  حق  يا  سعد  خد  مراتك  المستشفى... يلا  يا  رحمه... غيري  وروحي  مع  جوزك.. لازم  حد  يكشف عليكي  ونشوف  ايه  موضوع  النسيان  ده) 


مصطفى  الاب  قال  بحيره

(معقوله  يكون  عندها  زهايمر... دي  لسه  صغيره  اوي  ع المرض  ده) 


امير(هوه  المرض  ده  ماله  بالسن  ياحج... هيه  فعلاً   شكلها  عندها  مشكله... اصل  الواحده  تنسي  اكل ع النار... تنسي  معاد... لكن  ماتنساش  انها  اتجوزت... الحوار  ماينفعش  يتسكت  عليه) 


رحمه  تمنت  ان  تتلاشي  الان  من  خجلها... الشباب  سحبوا  نفسهم  خلف  بعض.. نظرا  لان  زوجه  اخيهم


تقف  عاريه  أمامهم... سعد  كان  مغتاظ  كثيراً  منها... قال  لها  آمرا

(ألبسي  هدومك... خليني  اشوف  حوارك  ايه  ع الصبح) 


ردت عليه  بأرتجاف

(مش هلبس  ولا  هقلع  ادامك... امشي  اطلع بره  عشان اغير هدومي...او ألبس  هدومي) 


سعد  قبض قبضته  بغضب  و سار إليها  ...نظرت له بخوف  وتردد...مسك شعرها  بعنف...صرخت  متألما


وضربت  يداه  ليبعد  عنها...لكنه  صفعها  ع وجهها  بقوه  وقال  بغضب


(دي اوضتي يا روح امك  ...دا بيتي  انا...مكسوفه  تغيري  ادامي...ليه  ان شاءالله...هشوف  ايه ما شفتهوش...انتي  كلك ع بعضك  من  شعرك  لرجلك  بان  عليا...انتي  مراتي...بتسمعي  منين...وحوار  ناسيه  و زهايمر  والكلام الفارغ  ده  ما يأكلش  معايا...مفيش  دكاتره  ولا  مستشفيات...وانتي  مراتي...عايزه  تصدقي صدقي  مش عايزه  عندك  الشقه  كلها  حيطه...اخبطي   دماغ ***أمك  ف اتخن  حيطه  فاهمه)


دفعها  بقوه  ع الفراش...وأخذ  ملابسه  وخرج  غاضبا..مشتعل غضبا  بمعني اوضح


رحمه  كالضائعه..لا تعي شيئاً...لا  تستوعب  ما هيه  فيه  وكيف  اقحمت  نفسها  مع  هذا  الرجل  الكريه

&&&&&&&&&&&&&&&&&&

ع الطريق


ف طريق العوده  من المطعم للمنزل....محمود  وفاطمه  يتحدثان  ف أمور  العمل


محمود  غاضب جداً جداً...ويطلب  منها  ان تبحث  له  عن اي  عمل  رجولي  لا يتطلب أوراق  رسمية


وصلا  المنطقة...لكن  لاحظت فاطمه شيئاً غريبا  وهما يسيران  ف اول الشارع..قالت له


(محمود  مش حاسس ان ف حاجه غريبه  ف الشارع النهارده)


(غريبه  إزاي...ف إيه)


(يعني  الناس  مقفله...وعم يحيي  قافل  الكشك  بتاعه  دي اوي مره  تحصل...حتي اللبان  بص  كده...ف ايه...الناس  فين)


محمود  توقف  فجأه...نظرت  له فاطمه  وجدته  ينظر  بغضب  أمامه...نظرت  هيه  الاخري...وصرخت  بهلع


رآت امامهم  بالقرب  من منزلها....رجال  كثيره....و رآت ما كانت  تخشاه  منصور  التركي   يقف  ف انتظارهم


اقترب  منصور  منهم  وهوه  يسير  بثقه  وغرور...ألقي  سيجارته  امامهم  بسخريه  وأستفزاز


قال  لمحمود  بتهكم

(بقا  حته  عيل  زيك  انت   ينسي نفسه...ويتحداني  انا...انت  مش  عارف  انا  مين  ياض)


محمود  بغضب

(لاء  معرفش  انت  مين  ياروح امك...انت  جاي  تخوفني  بشويه  ال*****  دول...انت  أهبل  ياض)


منصور  نظر  له  نظره  مبهمه...لا  غاضبه  او  ساخره...قال  محمود  لفاطمه


(امشي ع البيت...وما تفتحيش  الباب  لاي سبب..فاهمه)


فاطمه  بذعر(لاء  مش  همشي...انت  عايز  مننا  ايه  يا  منصور...رجالتك  اللي  بيضايقوه  محمود  ...انتوا  عايزين  ايه منه  حرام  عل...)


قاطعها  محمود  بمسك  يدها  والصراخ  فيها

(انتي بتتكلمي لييييه...قلت  لك  ع البيت)


نظرت  له  خائفه  منه وعليه... سارت للبيت  خوفاً  من  ان يصب  غضبه عليها...لكن


منصور  ركض  اليها   ..مسك  ذراعها...محمود  نظر  له  واحمرت عيناه  ونفرت  عروقه  من  الغضب


نظر  له  منصور  وهوه  يمسك  بزوجته  وقال  بسخريه

(رجالتي  اهم...وريني  هتضربهم  ازاي...وبطوطه  تلزمني...ورينا  رجولتك..وانا  اسيب  مراتك)


محمود  بغضب(ابعد  ايدك  عنها)


هز رأسه  منصور  شاره  لا...محمود  فقد  اعصابه...وركض  إليه  يسحقه...ركض  الرجال  عليه..لكنه  بكل  غضب


كان  يلكمهم  الواحد  تلو الاخر...من  يلكم  بقبضته  القويه  الغاضبه  يسقط  ولا  ينهض  مجدداً...منصور  اشار


للجميع  ان  يضربوا  محمود...تكاثروا  عليه...لكنه  لم  يخشاهم..ولا  يخشي  عددهم...ألتقط  سلاح من  أحدهم


وانهال  ضربا  قاسيا  ع  كل من يقترب  منه....فجأة  منصور  صرخ  ف  رجاله


(بس  كفاياااااااااا.....خلاص)


نظر  له  رجاله  ومحمود....ترك  منصور  يد  فاطمه...وقال  لها  وهوه  ينظر  لمحمود


(ارجعي  بيتك  يا  بطه...انا  عايز  جوزك  ف حوار  )


نظرت  له  بذهول...محمود  لم  يفهم  كلام  منصور...منصور  اشار  لها  ان  تذهب...محمود  صرخ  فيها


(امشييييييي)


سارت  ع مضض....منصور  اشار  لرجاله

(يلا...كل واحد  فيكوا  يشوف  بيعمل  ايه...تعالي  يا  محمود  عايزك)


وقف  الرجال  متألمين...والمجروح  منهم...يضع  يده  ع دماؤه  بتألم...انفض  الرجال  واقترب  منصور  من  محمود..بثقه...كأنهم  اصدقاء


محمود  لم  يهابه..وقف  وأنتظر  قدومه...وقف  منصور  امامه  وقال  له  بثقه


(امشي  معايا  عايزك)


محمود  اراد ان  يفهم...لما  تغير  منصور  سريعاً  ولما  يريده...سار  بجواره...اخرج  منصور  سجائره  وعرض


واحده  ع محمود...محمود  رفض...وشرب  من سجائره  الخاصه...ضحك  منصور  وقال  له


(ايه  يا عم  انت  بخيل  ولا  إيه)


(انت  عايز  إيه...انا  كل ده  سايبك  تجيب  اخرك...عايز  مني  ايه)


وقف  منصور  ونظر  لمحمود  بقوه   وقال  له

(اسمع يا محمود..انا  راجل  دوغري...وانت  اكيد  سمعت  عني...انا  محتاج  راجل  زيك  يشتغل  معايا...انت  الاول  كنت  هلس  ورجالتي  علموا  عليك...معرفش  ايه  اللي  غيرك  كده  وبقيت  بطل...دا  انت  يا  جدع  ما خدتش  خربوش  واحد  من  كل  الرجاله دي...انا محتاجك  يا  محمود)


(محتاجني...يعني  محتاجني  و ليه)


(محمود  سكه  ودوغري...انا  راجل  شمال  وشغلي  كله  شمال...تشتغل  معايا...وافق  وانا  هنغنغك...هتعيش  ف عز  بدل  الخرابه  اللي  انت  فيها  دي...ع فكره  انا  عرفت  كل حاجه  عنك...رجالتي  دخلوا  الخرابه  اللي انت  عايش  فيها  انت  وفاطمه  و لقيوا  الكراسه  اللي انت  كاتب  فيها  حكايتك...المهم...خلينا  ف المفيد...معانا  يا  محمود  الحكومه  مش  هتطول  منك  شعره...وهيبقا  معاك  فلوس  تقدر  تضرب  ورق  وتسافر  مكان  ما  تحب...وتعيش  ملك...بعد  ما  كنت  دلول  الخاينه...وراجل  هفأ  بتأخد  ع قفاك...ولا  شغلك  ف المطعم   ..دي  شغلانه  نسوان  يا جدع...المهم  وافق..وانا  هخليك  ملك  بجد..راجل  زيك  بقوتك  وشجاعتك  هينفعنا   اوي  اوي)


(شغل  ايه  ده  اللي  انت عايزني  فيه)


(ما قلت  لك  شغل  شمال)


(يعني  ايه  مخدارت  وسلاح..ولا  قتل  وخطف  ما الشمال  كتير  )


(ويفرق  معاك  ف ايه...احنا  وقت  الأوامر  ما بتيجي  لنا  من  الكبار  بنفذ...اللي  بيطلبوه...بنفذه  من  غير  سؤال)


(قصدك  يعني  زي  رفاعي الدسوقي  كده...ماشي...سبني  افكر  وأرد  عليك)


(محمود  فكر  كويس...كده  كده  هيه  خربانه معاك..وانت مجبر  تعيش  مع  بطه..اصل  انا  قريت  كل  حرف  انت  كتبته...عارف  اما  تشتغل  معايا...هيبقا  لك  بيت  ولا  مرات ابوك  تتحكم  فيك  ولا  تعيش  مع خاينه..ولا  تعيش  مع  بطه  اللي  انت  اصلا  نفسك  تخلص  منها..ومستخسر  نفسك  ف بت  قليله  زيها)


نظر  له  محمود  بغضب...لكن منصور  محق  ...هوه  من  كتب  هذا  ف مذكراته...اؤم  له  وقال


(برضو  هفكر  وأرد  عليك)


تركه  وعاد  لبيت  فاطمه...دخل  بمفاتحه  وجدها  تجلس  خائفه  ...وقفت  ونظرت  له  ..قالت  بتوتر


(انت  كويس   ...حصلك حاجه...)


(شششش...ف ايه  يا  بت...ما  انا  واقف  ع رجلي  قصادك  اهوه...ادخلي  اعملي  لي  قهوه...)


(حاضر  بس  مش  تقولي  منصور  كان  عايزك  ف ايه)


(وانتي  مال  اهلك  انتي...انتي  ولي آمري...يلا  اخلصي)


نظرت  له  بحزن  وعتاب...دخلت  المطبخ..جلس  هوه..وظل  يفكر  مليا  ف  عرض  منصور...وأخذ  قراره


خرجت  فاطمه  بالشاي...قال  لها

(اسمعي...انا  بكره  مش  هروح  معاكي  المطعم...انا  شفت  لي  شغلانه  تانيه)


(شغلانه...شغلانه  ايه  دي..اوعي..اوعي  تكون  هتشتغل  مع  منصور)


(وانتي  مالك...اشتغل  مع  اللي  اشتغل  معاه..وانتي  ليكي  فيه  ايه...يلا..غوري  ع اوضتك...غوري  خليني  اعرف  أفكر)


(محمود...بلاش...بلاش عشان  خاطري...منصور  ده  شيطان...شيطان  هيلبسك  ف الحيطه...هيوديك  ف ستين داهية...اوعي  تخليه  يضحك  عليك  بكلمتين  ...عشان  خاطري  يا  محمود..خلينا  جمب الحيط  احسن)


أشتعل  غضبا  منها...او  أراد  ان  يغضب  منها...مسك  يدها  بغضب  وصرخ  فيها


(خاطرك...خاطر  ايه  يام  خاطر  انتي....انتي  صدقتي  نفسك  يابت...فكرتي  انك  ليكي  خاطر  عندي  عشان  ب*****...دا انتي  ف سوق  النسوان  ما تسويش  بصله...دا  انا  ما  صدقت  لقيت  فرصه  ان  اخلص  من  خلقتك  دي...وأول  ما  الفلوس  تجري  ف إيدي  هطلقك  واغور  من  المنطقه  الزباله  دي  كلها...غوري  من  وشي  قال عشان  خاطري  قال)


محمود  ركل  كوب  الشاي...تحطم  الكوب...أخذ  سجائره  وفتح  باب  الشقه  بعنف...قالت  له  بعصبيه  


(لو  خرجت  ما ترجعش  تاني..لو  أشتغلت  مع  منصور  يبقا  ما تدخليش  بيتي  تاني)


محمود  بسخريه  غاضبه

(بيت  مين  يأم  بيت  انتي...انا  اصلا  مش  طايق  اقعد فيه  ساعه  واحده...ومش  عايز  اشوف  خلقتك  دي  تاني...بلا  قرف)


نظر لها بأحتقار  وأغلق  الباب  بعنف...انتفضت  مكانها...غير  مصدقه..انه  قال  هذا...انه  فعل  هذا


تعجبت...كيف  اصبح  المسالم  الطيب..قاسي   شرير  هكذا...ماذا حدث  لزوجها؟؟وكيف  سار  هكذا؟؟؟

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ف منزل يوسف

لم يستطع  ان ينام  طوال الليل  من الألم...ندم  لأنه  ترك  المشفي...ظهره  كان يؤلمه  بشده


ساقه  و اضلاعه  يؤلمانه  أيضاً....شعور  قاسي  متعب  يعيشه  يوسف...فتحت  ايمان عيناها


ومدت  يداها  لمست  وجه  يوسف...دفع  يدها  وقال

(ايه  يا جاموسه  قايمه  تلوشي  ع الصبح)


ضحكت  وهيه  تفرك  عيناها

(صباح الخير  يا توسف)


(صباح النور...قومي  والنبي  هاتي  لي  اشرب...عطشان  من  بدري  ومش  قادر  اقوم)


(قلبي  يا ناس...حاضر..حاضر)


قالتها  بجديه  جعلت يوسف  يتعجب  منها...وليس هذا  فقط  ما تعجب  منه  يوسف....إيمان  اعدت  له  وجبه


فطور  شهيه...وأحضرت  له  الدواء  خاصته...وكانت  بجواره  طوال الوقت...حضر  الشباب  وظلا  معه  معظم اليوم  ليساعدوه  ان  احتاج  مساعده


ف تلك الليله  مساءا....إيمان دخلت  له  وهيه  تحمل  قميص  نوم  قطني  خفيف  لتنام  فيه


فوجئ  يوسف  وسألها

(ايه  ده  يا إيمان...هتعملي  ايه)


(هلبسه  يا توسف...البيجامه  بتاعتي  وسخه...وانا مش  بحب  انام  بهدوم  كتيره)


قالت  هذا  وبدأت  تنزع  ثيابها..يوسف  ادار  وجهه  بعيداً  عنها...كانت  تبدل  ثيابها  بحريه...رغماً عنه  أختلس  نظره  لها


كم  كانت  جميلة...جسدها  رشيق جذاب...شعرها كالشلال  الذهبي  ع  ظهرها...بشرتها  بيضاء..عيناها تسلب الألباب


يوسف  لم يتمالك  نفسه  وهيه  تقف  امامه  شبه  عاريه...حاول  كبح جماعه  كي  لا  يتهور...لكنها جميله  جداً...شعر  انه  سيقف  ع قدمه  المكسوره  ليصل إليها


لكنها  لم تعطه  الفرصه  للمحاوله...قفزت  للفراش  وهيه  تضحك...زادت  الامر  سوءا  عليه  عندما  اقتربت  منه


ووضعت  قدمها  ع  قدمه  ويداها  حاصرتا  خصره..ورأسها  ع  صدره...يوسف  شعر  ببركان  لهب  يشتعل  ف اعصابه


وجد  نفسه  رغما  عنه  يدخل  يداه  ف  قميصها  المثير..رغم  انه  قميص نوم  عادي...نظرت  له  بنشوه  وقالت


(بتعمل  ايه يا  توسف...انا  بغير  من  ضهري...عايز  تلعب  معايا  ولا  اي..)


بلع  ريقه  بصعوبه..وأخذ  شهيق  طويل  وقال  وهوه  يغالب  شيطان  الرغبه


(الصراحه  يعني...اه...عايز  ألعب  معاكي...بس  مش  هينفع...ايمان...اغزي  الشيطان  وادخلي  نامي  ف اوضتك...قومي  من جمبي  يا  بنت الناس..وإلا  هعمل  حاجه  اندم  عليها)


(هتعمل  ايه  يعني)


(بلاش...بلاش  يا  ايمان  والنبي..قومي  من  جمبي)


(لاء  مس  هقوم...انا  عايزه  انام...هناااا...يلااا نام  انت  كمان)


(ياريت...ياريت  ياختي...طب فكره...قومي  هاتي  لي  المنوم  اللي  قاسم  جابه  لي..قومي  بسرعه)


نظرت  له متعجبه..لكنها  أذعنت  ونهضت  ...نظر  لجسدها  الذي  كشف  كله  وهيه  تنهض...اشاح  بوجهه  مرغما  كي  لا يفقد  اعصابه  ع الأخير


أتت  له  بالمنوم...أخذ  منه  بسرعه...كي  يغط  ف النوم  ويبتعد  عنها...قفزت  بجواره  مجدداً...وعادت  لوضعها السابق


يوسف  نظر  لها...ولايزال  يحترق  بداخله....رفعت  وجهها  له  ومدت  يدها  ع  جبهته  وقالت  بقلق


(توسف  انت  كويس...جسمك  سخن  اوي)


(بجد واللهي...صدقي  مش  واخد بالي...نامي...نامي  بالله عليكي يا إيمان)


ابتسمت  له  بقلق...لكن  لم  تبعد وجهها  عنه...يوسف  فقد  كل  ذره  تبقت  له  ف اعصابه..وجد  نفسه  يقبض  ع  وجهها...و  ألتهم  شفتيها  بعنف


صدمت  من  فعلته  واتسعت  عيناها  ذهولا...ابتعد  عنها  ونظر  لها..لم  تستطع  الكلام...كانت  مصدومه  من  فعلته


لكنه  لم  يتوقف..عاد  يقبلها  بنهم  وأفتراس  رغم  تألمه...لكن  الرغبه  والنشوه  لا يمنعهم  ولا يقف  ف طريقهم  اي  ألم  جسدي


يوسف  فجأه  شعر  بأرتخاء  اعصابه...ووجد  نفسه  يغط  ف النوم  وهوه  يقبلها...نظرت  له  وجدت  رأسه  تسقط


ع صدرها...قالت  وهيه  مذهوله...مصدومه

(توسف...توسف  مالك...توسف  انت  نمت  ليه...توسف  اصحي)


زمت  شفتيها  بضيق...ووضعت  رأسه  ع الوساده  ونامت  هيه  ع  صدره..لكنها  كانت  سعيده..تبتسم..دون  ان  تفهم  سبب  سعادتها


         يتبع ف الفصل 17

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